Body squeezed mind emerge

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The mind is called the ability of the brain, which enables man to think in thought, power, remembrance, judgment power, intelligence, sense, indoctrination, concentration, behavior, insight (insight) etc. In the general language, the mind body is the part or process that acts, thinks and understands any matter. This is a function of the brain. If we squeeze the body, then only the mind will emerge.

If you see this body completely squeezed, then the mind will emerge. Just as the basic element of Mehandi is redness, the milk is ghee, in the same way the basic element of this body is the mind. If we do complete refinement of milk, ghee will come out but not butter because if you put the butter in the fire again, it will also get ghee after burning it.

The mind is full of subject disorders. If our mind thinks that there is a common food then the mascot becomes active and it lags behind finding mango. All parts of our body are part of the mind. The reason for the back of the mascot was the taste of the tongue. The topic of the tongue is juicy. Just like when we see any flower, we enjoy it. This happiness came to mind through the eyes. Similarly, when we smell the flower, happiness through the nails itself comes to mind only. The subject of nails is fragrant.

Sometimes we go roaming and are attracted to seeing the beautiful things, which makes the mind enjoyable. The theme of the eyes is beauty. If we see some food, then there is water in the mouth. The thing to eat is the subject of mouth. If the eyes see a beautiful woman then the desire comes. Lust is also the subject of eyes.

Whatever the person sees in the dream, he feels the truth. This routine comes due to the state of the dream otherwise it was meditation. We are all looking at this world and the feeling of being the world is also happening to us. All of us are looking for the truth because its base is awakening. The four states, such as awakened, dream, sleep, and turiya, are the states of the mind. The Mind is an incarnation and it has innumerable arts. All these arts are being generated by the mind itself.

The simple thing is that when we are entangled in some material matter, then all of this is the result of our mind. The mind and its senses complement each other. The mind has to do whatever the senses want and the mind and the senses have to do it.

The task of mind is to fulfill the subjects of the senses. Just as at the time of marriage, husband and wife take the vow that whatever you desire will be my wish too and whatever desire will be mine, which desire will be yours too. Your desires and desires will be one. Whatever your decision will be, it will be mine too. That which will be your happiness will be my happiness too. On this basis, the husband wife lives together. Coordination in life is required to live together.

Similarly, the mind and senses are one. They do not go against each other. They have alliances with each other. Look like this our enemy is coming out. Mother’s sisters wear different types of gold ornaments. If all of them are melted together then it becomes the same gold. At this point, the distinction of their separation is over. Similarly, if we squeeze the body, then only the mind will emerge.

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शरीर का निचोड़ मन-

मन, मस्तिष्क की उस क्षमता को कहते हैं जो मनुष्य को चिंतन, शक्ति, स्मरण-शक्ति, निर्णय शक्ति, बुद्धि, भाव, इंद्रियाग्राह्यता, एकाग्रता, व्यवहार, परिज्ञान (अंतर्दृष्टि), इत्यादि में सक्षम बनाती है। सामान्य भाषा में मन शरीर वह हिस्सा या प्रक्रिया है जो किसी ज्ञातव्य को ग्रहण करने, सोचने और समझने का कार्य करता है। यह मस्तिष्क का एक प्रकार्य है।

यदि इस शरीर को पूरा निचोड़ कर देखेंगे तो मन ही निकलेगा। जिस प्रकार मेहँदी का मूल तत्व लालिमा, दूध का घी है उसी प्रकार इस शरीर का मूल तत्व मन है। यदि हम दूध का पूरा शोधन करेंगे तो घी ही निकलेगा मक्खन नहीं। क्योंकि मक्खन को फिर से आग में रखेंगे तो उसके जलने के बाद भी घी ही निकलेगा।

मन विषय विकारों से भरा पड़ा है। यदि हमारे मन ने सोचा कि आम खाना है तो मस्तिक्ष सक्रीय हो जाता है और आम को पाने के पीछे लग जाता है। हमारे शरीर के सभी अंग मन के ही अंग हैं। मस्तिक्ष को पीछे लगने का कारण जीभ का स्वाद था। जीभ का विषय रस है। ऐसे ही जब हम किसी फूल को देखते हैं तो हमको आनंद आता है। यह आनंद आंखों के माध्यम से मन को आया। इसी प्रकार जब हम फूल को सूंघते हैं तो नाख के माध्यम से आनंद भी मन को ही आया। नाख का विषय सुगन्ध है।

कभी-कभी हम घूमने जाते हैं और सुन्दर चीजों को देखकर आकर्षित होते हैं जिससे मन को आनंद मिलता है। आंखों का विषय सौंदर्यता है। हम कोई खाने की चीज़ देखते हैं तो मुँह में पानी आ जाता है। खाने की चीज़ मुँह का विषय है। आंखें किसी सुंदर स्त्री को देखती हैं तो वासना आ जाती है। वासना भी आंखों का ही विषय है।

इंसान सपने में जो कुछ देखता है उसे वह सच लगता है। यह नित्यता स्वप्न की अवस्था के कारण आती है अन्यथा वह तो एक चिन्तन था। हम सभी इस दुनिया को देख रहे हैं और दुनिया होने का आभास भी हमको हो रहा है। हमको सब चीज़ें सत्य लग रही हैं क्योंकि इसका आधार जाग्रत अवस्था है। चारों अवस्थायें जैसे जाग्रत, स्वप्न, सुसुप्ति और तुरिया, मन की अवस्थायें हैं। मन एक अवतार है और इसकी असंख्य कलायें हैं। ये सब कलायें मन से ही उतपन्न हो रही हैं।

सीधी सी बात यह हुई कि जब हम किसी भौतिक पदार्थ में उलझ रहे हैं तो ये सब हमारे मन की उपज है। मन और इसकी इन्द्रियाँ एक दूसरे के पूरक हैं। इन्द्रियाँ जो चाहती हैं मन को करना पड़ता है और जो मन चाहता है मस्तिक्ष और इन्द्रियों को करना पड़ता है। मन का कार्य इन्द्रियों के विषयों की पूर्ति करना है। जैसे विवाह के समय पति पत्नी संकल्प लेते हैं कि जो तुम्हारी इच्छा होगी वही मेरी भी इच्छा होगी और जो इच्छा मेरी होगी वह इच्छा तुम्हारी भी होगी। तुम्हारी इच्छायें और मेरी इच्छायें एक होंगी। जो तुम्हारा फैसला होगा, वही मेरा भी होगा। जो तुम्हारा सुख होगा वही मेरा भी सुख होगा इत्यादि। इस आधार पर पति पत्नी एक साथ रहते हैं। साथ रहने के लिये जीवन में समन्वय की आवश्यकता होती है।

इसी प्रकार मन और इन्द्रियाँ एक हैं। ये एक दूसरे के विरुद्ध नहीं जाते हैं। इनका आपस में गठजोड़ है। इस तरह देखने में हमारा शत्रु सामने आ रहा है। मातायें बहनें सोने के विभिन्न प्रकार के आभूषण पहनती हैं। यदि इन सबको मिला कर पिघला दिया जाये तो यह एक ही सोना हो जाता है। इस समय इनके अलग-अलग होने का भेद खत्म हो जाता है। इसी प्रकार यदि हम शरीर का निचोड़ निकालेंगे तो केवल मन ही निकलेगा।

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