Element Master

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The task of the element Master is to give knowledge.  Knowledge means understanding the abstract and unassuming and than recognizing the soul.

The task of the Master is not only to give them the knowledge of reading books or the rules and regulations of meditation. The task is to solve all the conflicts as well. Giving knowledge will give you the mind in your control. This power is with him, it will enlighten the soul. With the consciousness of the soul, the struggle with his mind will begin. So far the soul was unaware of its power. When there is a conflict with the mind, he realizes his power that he is a part of the absolute man. Humans come to such a sense that sensation comes after unconsciousness.

The master churns the heart of the man in such a way that after cutting the curd, the butter and whey separate separately. This In the situation, the feeling of separation of soul and mind becomes and the mind starts to understand. The first mind that was being desired was being done as it was the king. But now he comes in the role of a helper. Now he starts working with the permission of the soul.

The full power of doing the work of the mind starts getting noticed only because the soul lives in the human body as meditation. So far, the mind used to power by confusing the meditation. That is why after meditation, the meditation came to attention that the work went wrong, that was not to be done. Now there is no remorse. Success starts kissing your steps. All the tasks start to be meditated, in which all the possibilities of mistake end.

The soul or the meditation is omnipresent due to being a part of the incarnation. For this reason, the mind is unable to do extra work. Master by acquiring such knowledge, all the disorders of the human being begin to weaken and the man starts moving towards a pure consciousness, which makes the path of attaining element knowledge easier.

गुरु तत्व

गुरु का काम है ज्ञान देना। ज्ञान का अर्थ है सार ओर असार को समझना और आत्मतत्व को पहचानना।

गुरु का काम केवल इतना ही नहीं कि वे किताबें पढ़-पढ़ के ज्ञान दे या ध्यान लगाने की विधि व नियम बताये। गुरु का काम है कि जितनी भी उलझनें हैं उनको सुलझाये। गुरु ज्ञान देने से पहल मन को आपके वश में कर देगा। यह ताक़त गुरु के पास है वह आत्मतत्व को चैतन्य कर देगा। आत्मा के चैतन्य होते ही उसका मन के साथ संघर्ष शुरू हो जाएगा। अभी तक आत्मा अपनी शक्ति से अनभिज्ञ थी। मन के साथ संघर्ष होने पर उसको अपनी शक्ति का अहसास होता है कि वह तो परमपुरुष का अंश है। मनुष्य ऐसे होश में आने लगता है जैसे बेहोशी के बाद होश आता है।

गुरु मनुष्य के हृदय को इस प्रकार मथता है जैसे दही को मथने के बाद मक्खन और मट्ठा अलग -अलग हो जाता है। इस स्तिथि में आत्मा और मन के अलग-अलग होने का आभास हो जाता है और मन समझ में आने लगता हैं। पहले मन जो चाह रहा था वैसा किये जा रहा था क्योंकि वह राजा था। लेकिन अब वह वज़ीर की भूमिका में आ जाता है। अब वह आत्मा की अनुमति से कार्य करने लगता है।

मन को कार्य करने की पूरी शक्ति ध्यान से ही प्राप्त होने लगती है क्योंकि आत्मा ध्यान के रूप में मनुष्य के शरीर में रहती है। अभी तक मन ध्यान को भ्रमित करके शक्ति का उपयोग करता रहता था। इसीलिए कार्य हो जाने के बाद ध्यान आता था कि वह कार्य गलत हो गया, ऐसा नहीं करना था। अब पछताने की नोबत ही नहीं आती। सफलता आपके कदम चूमने लगती है। सारे कार्य ध्यान पूर्वक होने लगते है जिनमें गलती की सारी संभावनायें समाप्त हो जाती हैं।

आत्मा अथवा ध्यान ईस्वर का अंश होने के कारण सर्वशक्तिमान है। इस कारण मन फ़ालतू हरकत नहीं कर पाता। गुरु द्वारा ऐसा ज्ञान पाकर मनुष्य के सभी विकार कमज़ोर होने शुरू होने लगते हैं तथा मनुष्य एक शुद्ध चेतना की ओर अग्रसर होने लगता है जिससे तत्व ज्ञान को पाने का रास्ता आसान हो जाता है।

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