Evidence of soul

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The soul is a pure consciousness. The soul is the revelation. The soul is meditation. Evidence of soul is also found in the scriptures.

आत्मा एक शुद्ध चेतना है, आत्मा श्रुति है, आत्मा ध्यान है। शास्त्रों में इसका प्रमाण भी मिलता है।

There was a king named Janak. He asked to the people of his state, that in a moment can anyone of you give me the knowledge of soul?  He announced that he will give him his all assets and ornaments.

जनक नाम का एक राजा थे । उन्होंने  प्रजा से कहा कि कोई एक पल में आत्मज्ञान दे सकता है। उन्होंने घोषणा की कि वह उसे अपनी सभी संपत्ति और गहने देगा।

Ashtavakra said, I will give enlightenment in one moment. The story is mentioned in Bhagavad Gita’ https://www.santkabir.org/abstract-of-bhagwat-gita/ also. (The important texts of Advaita Vedanta are the sages of the ‘Ashtavakra Gita’ Despite his handicapped, he became famous by his scholarship) said that ‘O’ King if you want to enlighten by me, dedicate me body and money. King said that I gave you my body and wealth.

अष्टावक्र उठे बोले मै एक पल मै आत्मज्ञान दूंगा। अष्टावक्र का भगवतगीता मै भी उल्लेख है।अष्टावक्र (अद्वैत वेदान्त के महत्वपूर्ण ग्रन्थ ‘अष्टावक्र गीता’ के ऋषि हैं जो दिव्यांग होते हुए भी अपनी विद्वता से जगप्रसिद्ध हुए )अष्टावक्र ने कहा कि ‘हे’ राजा जनक! यदि आप मुझसे आत्मज्ञान चाहते हैं तो तन मन और धन मुझे समर्पित करो। राजा जनक ने कहा कि तन मन धन मैंने आपको दिया।

First of all you dedicate your body and wealth to me? The King said that I am agreeing to give you my body and wealth.  He said yes. Ashtavakra said, today your body is mine. Do not think that you have wife, child, brother, sister a relative etc.

सबसे पहले आप अपना शरीर और धन मुझे समर्पित करें? राजा जनक ने कहा कि मैं आपको अपना शरीर और धन देने के लिए सहमत हूं। उन्होंने कहा कि हाँ। अष्टावक्र ने कहा, आज आपका शरीर मेरा है। यह मत सोचिए कि आपकी पत्नी, बच्चे, भाई, बहन एक रिश्तेदार आदि हैं।

You gave me your mind, now you are mine. Everything from this body is mine, it is not yours. The King has said okay.

तुमने मुझे अपना मन दिया, अब तुम मेरे हो। इस शरीर से सब कुछ मेरा है, यह तुम्हारा नहीं है। राजा जनक ने कहा ठीक है।

‘Oh’ father, your money is also mine, gold, money, diamond, gems, Army, weapons, castle etc. All this is not yours, King said okay, all this I will give you by Now, I will do it.

‘हे’ पिता, तुम्हारा धन भी मेरा है, सोना, धन, हीरा, रत्न, सेना, शस्त्र, महल आदि। यह सब तुम्हारा नहीं है, राजा जनक ने कहा ठीक है, यह सब मैं तुम्हें अब तक दूंगा, मैं इसे करूंगा।

Ashtavakra said now you will not think of anything from this mind too because your mind has also been mine. I command you to see inside you, resolve any decision, and do not do any action. See what is left now with you?

अष्टावक्र ने कहा अब तुम इस मन से कुछ भी नहीं सोचोगे क्योंकि तुम्हारा मन भी मेरा है। मैं तुम्हें अपने भीतर देखने, किसी भी निर्णय को हल करने की आज्ञा देता हूं। देखें अब आपके पास क्या बचा है?

The King closed his eyes to see inside deep and said, “Guru (Master), today you have given me the knowledge of the soul.” I got the knowledge of the soul.

राजा जनक ने ऑंखें बंद की और बोले हे गुरुवर आज आपने मुझे आत्मा का ज्ञान करा दिया। मुझे आत्मा का ज्ञान हो गया।

Here a question arises that whether Ashtavakra removed his soul from the King body and showed that the father’s view that your soul? If it is fact, than would have had three people there i.e Ashtavakra, King and his soul.

यहाँ पर यह सवाल उठता है कि क्या अष्टावक्र ने राजा जनक को उनकी आत्मा निकालकर दिखायी कि हे जनक देखो ये है तुम्हारी आत्मा! अगर ऐसा होता तो तीन लोग होते।एक अष्टावक्र एक जनक और एक जनक की आत्मा

Therefore, there is no seer of this soul. These senses can not see this soul because the soul is beyond the limits of it. All that remains after the ego stops is the soul.

इसलिये इस आत्मा का कोई द्रष्टा नहीं है। ये इन्द्रियाँ इस आत्मा को नही देख सकतीं क्योंकि आत्मा इनसे सर्वथा परे है। मन,बुद्धि, चित्त, अहंकार के रुकने के बाद जो शेष बचता है वह आत्मा है।

That is why all Religious books are saying meditating meditation meditation. All are saying to meditate because when we are concentrated, this soul has ability to work without the eyes, without nose and without ears. If the meditation becomes concentrated, then you will know yourself. Therefore, if the mind does not concentrate, it wants to keep the meditation confused all the time.

इसलिये सभी धर्मशास्त्र ध्यान ध्यान ध्यान कह रहे है। ध्यान लगाने को बोल रहे है। सभी ध्यान लगाने को इसलिये बोल रहे है क्योंकि जब हम एकाग्र होते है तो इस आत्मा मै बगैर ऑंखों के ही देखने की क्षमता है बगैर नाक, कान, मुंह, शरीर, यह इनके सारे काम कर सकती है। यदि ध्यान एकाग्र हो गया तो आप अपने को जान जाएंगे। इसलिये मन एकाग्र नहीँ होने देता वह ध्यान को हर समय भ्रमित करके रखना चाहता है।

In ‘Bhagavad Gita’ Sri Krishna told O’ Arjuna that your name is not the name of this soul, yet he can see it from all directions. Similarly the Ear of soul can hear from all directions. Soul does not have the feet, yet he can move from all directions and work again. So to attain enlightenment, ‘O’ Arjuna, chasten your mind.

गीता मै श्री कृष्ण ने अर्जुन से कहा था कि ‘हे’ अर्जुन इस आत्मा कि आँखे नहीँ हैं, फिर भी ये सभी दिशाओं से देख सकती है, ‘हे’अर्जुन, इस आत्मा के कान नहीँ हैं, फिर भी सभी दिशाओं से सुन सकती है। ‘हे’ अर्जुन इस आत्मा के हाथ पैर नहीं फिर भी सभी दिशाओं से चल फिर सकती है
इसलिये आत्मज्ञान को पाने के लिए ‘हे’ अर्जुन तुम मन का निग्रह करो।

It means that whatever is being contemplated inside us, it is not the soul too, and the soul is beyond the resolution and option.

इसका तात्पर्य यह है कि जो हमारे अंदर चिंतन हो रहा है यह भी आत्मा नहीँ है, आत्मा संकल्प विकल्प से परे है।

Whatever we are remembering is that to work is to do that work, it is not a soul too. Whatever physical activity we perform everyday, this is not a soul too. It is a mind.

जो हमें याद आ रहा है  कि यह काम करना है वह काम करना है यह भी आत्मा नहीँ है।जो शारीरिक क्रियाएँ हम रोज करते हैं यह भी आत्मा नही है।यानि यह मन है।

We are all confused with this activity of mind. We have always forgotten something, so there is something to do. Inside Busy body it is an experience rather minds.

आम आदमी इसी मै उलझा हुआ है।कभी कुछ याद आ रहा है कभी कुछ करना है इसलिये आत्मा व्यस्त हो गयी।आत्मा के शरीर मै होने कि यह मन की एक अनुभूती है।

Suppose there is an empty pitcher. There is emptiness inside him. Where will the emptiness go when the pot splits? It will be there.

जैसे एक खाली घड़ा है उसके अंदर एक शून्य है जब घड़ा फूट गया तो शून्य कहाँ गया।शून्य तो वहीँ रहा क्योंकि शून्य घड़ा फूटने के बाद फैला थोड़ी वह शून्य वही रहा।

Similarly the soul is present everywhere. The soul is stable, while the mind is unstable. The spirit is experiencing the body due to its existence.

इसी तरह आत्मा सब जगह विद्यमान है।आत्मा स्थिर है जबकि मन अस्थिर है।आत्मा का अनुभव शरीर होने के कारण हो रहा है।

That is why the creature keeps wandering in resolution and option for several hours. This is the game of mind. The mind is not leaving us free even for a moment. Thus the mind keeps this soul confusing at all times. The body mechanism and the things do not allow the soul to go to the original person’s, original place.

इसलिये जीव चोबीशों घंटे संकल्प ओर विकल्प मै घूमता रहता है।यह मन का खेल है। मन एक पल के लिये भी जीव को फ्री नहीं छोड़ रहा है। इस प्रकार यह मन इस आत्मा को हर समय भ्रमित करके रखता है। मन और माया आत्मा को अपने मूल स्थान, परम पुरुष की तरफ नहीं जाने देतीं।

Now you should notice that when a child is crying, the mother distracts him by giving him a toy. Mother gave a toy and Meditation was removed from the original and turned away. The example does not show that somewhere the mind has kept us confused like this?

अब आप गौर करें कि जब छोटा बच्चा रोता है तो माँ उसके हाथ मै खिलौना देकर उसका ध्यान बंटा देती है और वो रोना बंद कर देता है।माँ ने खिलौना देकर उसका ध्यान मूल से हटा कर कहीँ और कर दिया। उदाहरण से पता नहीं चलता कि कही न कहीँ हमको भी मन ने ऐसे ही उलझा रखा है?

Goswami Tulsidas said that- I tell you an untold story that can be understood but can’t be spoken. It is sitting indestructible God within the living beings, who can’t understand because of Maya’s (illusion) fascination. It is as if a monkey, despite being sensible, could not free himself from bondage.

गोस्वामी जी ने कहा कि- मैं आपको एक अनकही कहानी सुनाता हूं जिसे समझा जा सकता है लेकिन बोला नहीं जा सकता। यह जीवित प्राणियों के भीतर अविनाशी भगवान बैठा है, जो माया के आकर्षण के कारण समझ नहीं सकते हैं। यह ऐसा है जैसे समझदार होने के बावजूद एक बंदर खुद को बंधन से मुक्त नहीं कर सका।

“सुनहु तात ये अकथ कहानी, समझत बिरहे न जाय बखानी,
ईश्वर अंश जीव अविनाशी, चेतन, अमल, सहज, सुखराशी,
सो माया बस भयो गुशाइ, बन्धयो कीर मर्कट के माही।“

The soul is trapped in the web. This bond is false but looks true. The soul has unknowingly held this body and otherwise no one can catch the soul.

यह आत्मा बंध गयी है। यह गठान झूठी है परंतु फिर भी सच लग रही है। आत्मा ने अज्ञान वस इस शरीर को धारण किया हैं इसको पकड़कर रखा है वरना आत्मा को कोई पकड़ नहीं सकता।

Such monkey catch nuts without opening the clay inside the pitcher similarly, without understanding the mind, the creature can’t escape from it.

जैसे बन्दर चनों को घड़े के अंदर मुठी खोले बिना अपने को मुक्त नहीं कर सकता उसी प्रकार जीव भी मन को समझे बिना उससे टक्कर नहीं ले सकता ।

When the soul embraces life, then it becomes a creature. When the soul leaves life, then it becomes the soul. If the soul is aware of its original home then it will leave the bonds of death and go to “ultimate God” (Supreme Being/Person) , but if you do not know the house then you will wander.

आत्मा ने जब प्राणों को धारण किया तब वह जीव बना.जब जीव प्राणों को छोड़ देता है तो वो आत्मा बन जाता है.यदि आत्मा को अपने मूल घर का ठीक ठीक पता होगा तो वह जन्म मृत्यु के बंधनों से छूटकर सतलोक चला जायेगा परन्तु यदि घर का पता नहीं तो भटकता रहेगा.

 

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