Function of mind

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The mind has three basic functions: thinking, feeling, and wanting. The three functions of the mind are thoughts, feelings, and desires, can be guided or directed either by one’s native ego centrism or by one’s potential rational capacities. Egocentric tendencies function automatically and unconsciously.

Look at the functioning of the mind. The method of working of the mind is called ego. It is the closest enemy of the organism. As an example, the mind said that need mango fruit to eat. The brain immediately decides very fast whether the season of mango or not?

This network is so sharp and finer that human beings do not understand. The language of the mind is so tremendous that instantly the intellect decides that it is not a mango fruit season. Just when the decision comes, the mind goes silent. Even if this message is reached to the mouth, then it also keeps quiet.

If brain decides that there is a season of mango, then brain decides whether there is money to buy or not? Because it is necessary to buy, therefore, brain decides that yes. Some desires of the creatures are fulfilled and some not. The reason for this is that intelligence analyzes.

For example, if our mind is angry, then due to anger, intelligence can not make the right decision, due to which it puts a tampered pull on the man in front. But when the intellect says that the person can be revange by his friends, relatives and they can also register a complaint in the police against me, then the mind is frightened by the anger of being angry and decides not to hit the person. If the intellect said that hit… then it begins to beat.

When the intellect has decided that there is a season of mango and there is money, then this decision now reaches the memory. All departments are different. The mind comes and tells where the mango will get. The question is how did memory know that mango will get there? Because all senses of the mind are complementary to each other. The eyes, nails, ears, mouth, and skin are these sensory centers. Mind, intellect, memory, and ego are the forms of the mind like water as in the form of ice and vapor.

Whether the senses are the mechanisms or the senses, it is the supplement of the mind. That’s why I remembered memory because she had one day going on the way saw the fruit shop. Anyone who has seen these eyes, whatever sniffs with nose, whatever heard from the ears, whatever ate from the mouth and whatever touched the skin, all these are stored in our memory.

After reviewing the memory of the fruits, the turn of the ego began. Ego is action. Because of the action, the feet run towards the direction of the shop. The mouth asked for mango, hands have lent money and got mangoes.  Now the mouth has to eat. After digestion, the waste will come out through tubes. Now let’s think of ourselves that all this has happened or not.

Kabir said that – if you squeeze this body then the mind will come out!

Therefore, the big knowledgeable men also failed to conquer their mind. They lived in solitary confinement in the forests to control it and went hungry and hung on hungry to control and understand it, but remained unsuccessful. Thus man is working according to the mind. The soul has nothing to do with it because there is no sense in the soul. The soul is beyond the senses. Fourteen senses are property of the mind.

In Bhagwat Geeta, Shri Krishna told Arjun that “O Arjun”, if you want to get self-knowledge, and then first understand the functioning of this mind. Arjun said, “Lord, this mind is not stable. That’s why I am not able to understand it. If you say me to bind the wind, then I will try. Although this is not so easy but I will try, but understanding the mind is not a matter of my control. I am not able to control my mind.

The mind that binds the soul is not a slight strength. By hearing two four stories, by placing two dip in the river, doing four orbiting, it will not come under control.

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मन की कार्यप्रणाली

मन की कार्यप्रणाली पर नज़र डालते हैं। मन के कार्य करने की विधि को अहंकार कहते हैं। यह जीव का सबसे नजदीकी शत्रु है। उदाहरण के रूप में मन ने कहा कि आम खाना है। बुद्धि तुरन्त फैसला करती है कि आम का सीजन है या नहीं? यह काम बहुत तेज़ी से होता है।

यह नेटवर्क इतना तेज और बारीक है कि इंसान के समझ में नहीं आ रहा है। मन की भाषा इतनी जबरदस्त है कि तुरन्त बुद्धि फैसला करके बोल देती ही कि आम का सीजन नहीं है। बस इस फैसले के आते ही मन चुप बैठ जाता है। यह संदेश मुँह के पास भी पहुँच गया तो वह भी चुप बैठ जाता है।

अगर बुद्धि ने फैसला किया कि आम का सीजन है तो बुद्धि फैसला करती है कि क्या आम खरीदने के लिये पैसे हैं या नहीं? क्योंकि आम तो खरीदना है इसलिये बुद्धि फैसला करती है कि हाँ पैसे हैं, आम खरीदेंगे और खाएंगे। जीव की कुछ इच्छाओं की पूर्ति होती है और कुछ की नहीं होती है। इसका कारण यह होता है कि बुद्धि विश्लेषण करती है।

उदाहरण स्वरूप यदि हमारा मन क्रोधित है तो क्रोध आने के कारण बुद्धि सही निर्णय नहीं कर पाती जिस कारण वह सामने वाले मनुष्य पर खींच के एक तमाचा लगा देता है। पर जब बुद्धि कहती है कि उस व्यक्ति कि इसके दोस्त,रिश्तेदार आकर बदला भी ले सकते हैं और ये पुलिस में शिकायत भी दर्ज करा सकते हैं तो मन क्रोधित होने के बाबजूत डर जाता है और तमाचा नहीं मारने का निर्णय करता है। अगर बुद्धि ने कहा कि मारो, तो पीटना शुरु कर देता है।

जब बुद्धि ने निर्णय कर लिया कि आम का सीजन भी है और पैसे भी हैं, तो अब ये निर्णय चित्त के पास पहुँच जाता है। सब महकमे अलग-अलग हैं। चित्त आकर बताता है कि आम कहाँ मिलेगा। सवाल ये है कि चित्त को कैसे पता चला कि आम वहाँ मिलेगा? क्योंकि मन की सभी इन्द्रियाँ एक दूसरे की पूरक हैं। आंख, नाख, कान, मुँह और त्वचा ये ज्ञानेन्द्रियाँ हैं इन्हीं से वस्तु का ज्ञान होता है। मन, बुद्धि, चित्त और अहंकार ये मन के ही स्वरूप हैं जैसे पानी के स्वरूप बर्फ और भाप होते हैं।

इन्द्रियाँ चाहे वह कर्मेन्द्रियाँ हों या ज्ञानेन्द्रियाँ हों, ये मन की पूरक हैं। इसलिये चित्त को याद था क्योंकि उसने एक दिनरास्ते में जाते हुए फल की दुकान देखी थी। इन आँखों ने जो भी देखा, नाख से जो भी सूंघा, कानों से जो भी सुना, मुँह से जो भी खाया और त्वचा से जिसका भी स्पर्श किया, ये सब हमारे चित्त में जमा होता है। चित्त के फल की दुकान की याद दिलाने के बाद अब अहंकार के महकमे की बारी आयी। अहंकार यानी क्रिया। क्रिया के कारण पैर दुकान की दिशा की ओर चल दिये। मुँह ने दुकान पहुंचकर कहा आम चाहिये, हाथों ने पैसों का लेन देन किया। आम मिल गए। अब मुँह ने खाया, पचने के बाद अपविष्ठ को मल और मूत्र की नलियों ने बाहर किया।

अब आप खुद ही विचार करें कि यह सब मन हुआ कि नहीं। कबीर जी ने कहा कि –

 “संतो तन चिन्हे मन पाया”

कबीर कहते हैं कि इस शरीर को निचोड़ोगे तो मन ही निकलेगा!

इसलिए बड़े बड़े ज्ञानी पुरुष भी अपने मन को जीत पाने में असफल रहे। वे लोग इसे वश में करने को जंगलों में एकांतवास में रहकर भूखे प्यासे रहकर अपना शरीर गलाकर इसको नियंत्रित करने और समझने के लिये गये, पर असफल ही रहे। इस प्रकार मनुष्य मन के अनुसार काम कर रहा है। आत्मा का इससे कोई लेना-देना नहीं है। क्योंकि आत्मा में कोई इंद्री नहीं होती । आत्मा इन्द्रियों से परे है। जिस चीज़ मैं चौदह इन्द्रियाँ हैं वह मन है।

भागवत गीता में श्री कृष्ण ने अर्जुन से कहा कि हे अर्जुन यदि तुम आत्म ज्ञान पाना चाहते हो तो सबसे पहले इस मन की कार्यप्रणाली को समझो। अर्जुन बोले है भगवन ये मन परिवर्तनशील है। इसलिए समझ में नहीं आ रहा है। यदि आप कहेंगे कि हवा की गांठ बांधो तो भी मैं प्रयास करूंगा। हालाँकि यह भी इतना आसान नहीं पर मैं कोशिश करूंगा पर मन को समझना मेरे वश की बात नहीं है। मैं मन को वश में करने में हार चुका हूँ।

आत्मा को बांधकर रखने वाला मन कोई मामूली ताक़त नहीं है। दो चार कथा सुनकर, दो डुबकियां लगाकर, चार परिक्रमा करके, यह वश में आने वाला नहीं।


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