Great Personality

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Saint Kabir had been a leading and fearless truth-seeker of medieval times, who guided the people for a long time. As well as running his livelihood he used to do Satsang (a spiritual discourse or sacred gathering) regularly. In their Satsanga, the participation of poor and rich people of almost all sections was involved. In those days there was a great discussion of the great personality of a richer person’s humanity and goodness in the city. People who attended Satsang often used to talk about him.

One day after the Satsang, one of his disciples started discussing a big man in the city. He started praising rich, saying that he has built many Dharamshala (Shelter for needy) in the city and he also helps the needy in the places of worship. They also give money for food and clothing to the poor in their palace. Certainly, he is a great philanthropist. This thing is known to all people that there is no bigger and noble person in the city.

Saint Kabir told his disciple that what seems to be, it is foolish to believe in him as a complete truth. Maybe the person is just displaying his wealth and it may also be that the person in the city is also a noble person and a big bourgeoisie too? The disciple said how will it know? Kabir said that this will only be known after taking the exam.

The next day Kabir changed his disguise with his disciple and headed towards the city. Before going to his palace, he went to the house of a poor merchant who was his devotee. Because of the revenge of Kabir, he could not recognize them. He welcomed the guests and asked to eat and served with affectionately feeding.

After this Kabir reached the capitalist’s palace. the safety guards stopped them and said why have they come here? Kabir said that there was a desire to meet with the capitalist. Seeing ordinary costumes, the dignitaries said that go away from here. If Kabir did not go, the concerns gave this information to him. He was resting at that time. He was getting angry because of a fall in sleep. The dignitaries said that there is a poor man and is insisting on meeting you. We tried to run away but he was stuck in his stance.

Capitalist got up in anger and came to the palace gate to rebuke the person and saw that a lot of people were watching the fun. Suddenly he controlled his anger and said that this time we have to rest. After a few days, we will do a Bhandara (food as a worship offering) in the big temple, on that day you will come there, I will arrange food, clothes etc there. By saying this, he returns to his place saying abuse to the poor.

The disciple who came with Kabir had no such hope. Seeing such behavior,  he was speechless and stunned. Then Kabir told the disciple that, even though a person who is rich and prosperous, can not be given time to honor and necessary help to the disadvantaged people, how can he be called bigger?

बड़ा हुआ तो क्या हुआ, जैसे पेड़ खजूर।
पंछी को छाया नहीं, फल लागे अति दूर।।

Kabir said that what is the advantage of growing like a date tree, which can not shade the incoming person and the fruit that it takes too far is also far from reach.

Human Character

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 Hindi Translation-

संत कबीरदास मध्यकाल के एक प्रमुख व निर्भीक सत्य कहने वाले संत हुए थे, जिन्होंने जनमानस का लंबे समय तक मार्गदर्शन किया। अपनी जीविका चलाने के साथ-साथ वह नियमित रूप से सत्संग किया करते थे। उनके सत्संगों में लगभग सभी वर्गों के गरीब व सेठ लोगों की भागीदारी होती थी। उन दिनों नगर में एक सेठ की मानवता और नेक दिली की बड़ी चर्चा थी। सत्संग में आने वाले लोग भी अक्सर उसकी बातें किया करते थे।

एक दिन सत्संग के समाप्त होने के बाद उनका एक शिष्य शहर के एक बड़े सेठ आदमी की चर्चा करने लगा। वह एक सेठ की प्रसंशा करते हुए कहने लगा कि शहर मेें उन्होंने अनेकों धर्मशालाएं बनवाई हैं साथ ही वह धर्मस्थानों में जाकर जरुरतमंदों की मदद भी करते हैं। अपने महल में आने वाले गरीबों को वे भोजन और वस्त्र के लिए धन भी देते हैं। निश्चित रूप से वह एक बड़े परोपकारी मनुष्य है। यह बात सभी लोग जानते है कि शहर में उससे बड़ा और नेक व्यक्ति कोई नहीं है।

संत कबीर ने अपने शिष्य से कहा कि जो दिखता है असल में उसी को पूर्ण सत्य मान लेना मूर्खता है। हो सकता है वह व्यक्ति केवल अपनी धन संपदा का प्रदर्शन कर रहा हो और यह भी हो सकता है कि शहर में उससे भी बड़े नेक दिल वाले व्यक्ति और बड़े पूंजीपति भी हों?  शिष्य ने कहा कि इसका पता कैसे चलेगा? कबीर ने कहा कि यह तो परीक्षा लेने के बाद ही पता चलेगा।

अगले दिन कबीर अपने शिष्य के साथ भेष बदलकर शहर की ओर चल पड़े। वह उस सेठ के महल में जाने से पहले वे एक गरीब बढई के घर गये जो उनके सत्संग में आता था। कबीर का भेष बदला होने के कारण वह बढई उन्हें पहचान न सका। उसने घर में अतिथि आने पर उनका स्वागत-सत्कार किया और भोजन करने को कहा तथा  सामर्थ्यनुसार प्रेमपूर्वक भोजन खिलाकर विदा किया।

इसके पश्चात कबीर उस पूंजीपति के महल में पहुँचे। महल के गेट पर  पहुँचने पर दरबानों ने उन्हें रोक दिया और कहा कि यहां क्यों आये हो? कबीर ने कहा कि सेेेठ साहिब से मिलने की इच्छा थी, इसलिए यहां आये हैं। साधारण वेशभूषा देखकर दरबानों ने कहा कि चले जाओ यहां से। कबीर नहीं गये तो दरबानों ने इसकी जानकारी सेठ को दी। सेठ उस समय आराम कर रहा था। नींद में विघ्न पड़ने के कारण उसको गुस्सा आ रहा था। दरबानों ने कहा कि कोई गरीब आदमी है और आपसे मिलने की जिद कर रहा है।

हमने उसे भागने की कोसिस भी करी पर वह अपनी जिद में अड़ा हुआ है। सेठ जी गुस्से में उठकर उस व्यक्ति को फटकारने के लिए महल के द्वार पर आये तो देखा कि वहाँ काफी सारे लोग तमासा देख रहे थे। सेठ ने अपना गुस्सा नियंत्रित कर लिया और बोला यह समय हमारे आराम करने का है। कुछ दिन बाद हम बड़े मंदिर में एक भंडारा करेेंगए , उस दिन तुम लोग वहाँ आ जाना, वहां मै भोजन, वस्त्र इत्यादि की व्यवस्था कर दूँगा। यह कहकर वह  गरीब को अपशब्द कहता हुआ घर के भीतर चला गया।

कबीर के साथ आये शिष्य को सेठ से ऐसी उम्मीद न थी। सेठ का ऐसा व्यवहार देखकर वह अवाक रह गया। तब कबीर ने शिष्य से कहा कि जो व्यक्ति कुलीन और संपन्न होने के बावजूद अभावग्रस्त लोगों को समय पर सम्मान और आवश्यक मदद नहीं दे सकता है, उसको बड़ा कैसे कहा जा सकता है।

 बड़ा हुआ तो क्या हुआ, जैसे पेड़ खजूर।
पंछी को छाया नहीं, फल लागे अति दूर।।

कबीर ने कहा कि खजूर के पेड़ के तरह बड़ा होने का क्या फायदा जो आने वाले को छाया भी न दे सके और उसमें लगने वाला फल भी पहुंच से बहुत दूर हो।

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