Happiness is my goal

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Once a frustrated women asks Sant Kabir that I have heard that life is happy by meditating and enjoys immense happiness. I also want to be happy because my only goal in life right now is to be happy. Can you tell what meditation is? What happens to us during meditation?

He says that I tell you a story of a little child. Once upon a time, a child goes to the shore of the pond and sees that another child like him is also in the water. Seeing this, the boy is surprised because he is seeing himself in water for the first time.

There are some small stone pebbles lying on the banks of the pond, the child picks up some pebbles and starts putting them in the water. On pouring the pebble, some waves start to rise in the water, due to which the child is no longer able to see himself in that water.

The child is very happy to see the rising waves and the child puts some more pebbles in the water. More waves arise in the water and he starts enjoying it very much. The child constantly pours pebbles into the water and sees the ripples of those waves.

For a few days, the child comes to the banks of the pond every day and starts pouring stone pebbles in the water, but even though he is unable to see himself in the water. He puts more stones and thinks that by putting more pebbles he will be able to see himself.

That boy now gets very upset because he no longer enjoys that upheavel. He wants to see himself in the water again, but he does not know how he will get the situation he had got earlier.

A person is passing by the pond. He looks at the child and says why are you so upset? Why are you repeatedly putting stones in water? The child tells the person that when I came here for the first time, I could see myself in the water. But now I want to see myself again but not seeing it! What should I do?

The person tells the child to throw the stones you have in your hand first. The child throws them away.

The person tells the child to watch the waves that are rising in the water. The child starts watching those waves carefully. After some time, the child sees that the waves are getting calm and the water is settling. Now he sees his hands, feet and face moving in water and he is very happy. After a while, that water becomes stagnant and that child starts seeing himself as he saw himself in the water for the first time.

Saint Kabir tells that depressed person that this state is meditation. He says that you are also throwing stones in water and sitting in the hope that you will be able to see yourself in water. To see yourself, first you have to throw the stones of your hands and see the waves that are rising in the water.

The stones in this story are your thoughts. Throwing stones by hand means sitting in meditation and watching what is happening. You are the water of the pond. When thoughts enter inside you, you start thinking something continuously. But when you sit in meditation, then you do not allow thoughts to come inside you. Whatever thoughts come inside us, our information is from our senses and we get the most information from our eyes.

So while meditating, we close our eyes and stop taking information from outside. After that whatever turmoil is happening within us is within us. When you sit in meditation, whatever upheaval happens is related to our old eclipsed information.

Suppose there is a pitcher and there is a hole in its bottom. You will be tired by adding water to it, but it will never be full. But when you stop adding water to it, there will come a time that the pot will be completely empty.

When we sit in meditation, the same phenomenon happens within us. If we watch with patience how thoughts arise and calm down then you will find your destination.

खुशी ही मेरा उद्देश्य

एक बार एक निराश व्यक्ति संत कबीर से पूछता है कि मैंने सुना है कि ध्यान लगाने से जीवन सुखमय होता है और अपार खुशी का आनन्द मिलता है। मैं भी खुश रहना चाहता हूँ क्योंकि खुशी ही मेरा उद्देश्य है। क्या आप बता सकते हैं कि ध्यान क्या है? ध्यान के दौरान हमारे साथ क्या घटित होता है?

 वह कहते हैं कि मैं तुम्हें एक बालक की छोटी सी कहानी सुनाता हूँ। एक बार एक बालक एक तालाब के किनारे पर जाता है और देखता है कि उसके जैसा एक और बालक पानी में भी है। यह देखकर वह बालक बड़ा आश्चर्यचकित होता है क्योंकि वह पहली बार अपने आप को पानी में देख रहा होता है।

 तालाब के किनारे कुछ छोटे-छोटे पत्थर के कंकड़ पड़े होते हैं, वह बालक कुछ कंकड़ उठाता है और उस पानी में डालने लगता है। कंकड़ डालने पर पानी में कुछ तरंगें उठने लगती हैं, जिस कारण वह बालक अब अपने को उस पानी में नहीं देख पाता है।

 उस बालक को उठती तरंगों को देखकर बड़ा अच्छा लगता है और वह बालक कुछ और कंकड़ पानी में डालता है। पानी में और तरंगें उठती हैं और उसे बहुत मजा आने लगता है। वह बालक लगातार कंकड़ों को पानी में डालता रहता है और उन तरंगों की उथल पुथल होते देखता रहता है।

 कुछ दिनों तक वह बालक रोज़ तालाब के किनारे आकर पानी में पत्थर के कंकड़ डालने आने लगता है परंतु चाह कर भी वह अपने आपको पानी में नहीं देख पाता है। वह और पत्थर डालता है और सोचता है कि ज्यादा कंकड़ डालकर वह अपने आपको देख पायेगा।

 वह बालक अब बहुत परेशान हो जाता है क्योंकि अब उसे उस उथल पुथल में मज़ा नहीं आता है। वह अपने आपको को पानी में दुबारा देखना चाहता है पर उसको यह मालूम नहीं कि जो स्थिति उसको पहले मिली थी, वह कैसे मिलेगी!

 एक व्यक्ति तालाब के पास से गुज़र रहा होता है। वह बालक को देखकर कहता है कि तुम इतने परेशान क्यों हो? बार-बार पानी में पत्थर क्यों डाल रहे हो? वह बालक उस व्यक्ति से कहता है कि जब मैं यहाँ पहली बार आया था तो अपने आपको पानी में देख सकता था। परन्तु अब मैं पुनः अपने आपको देखना चाहता हूँ लेकिन दिखाई नहीं दे रहा हूँ! मैं क्या करूँ?

 वह व्यक्ति उस बालक से कहता है कि जो पत्थर तुमने अपने हाथ में लिये हैं उनको पहले फैंक दो। वह बालक उनको फेंक देता है।

 वह व्यक्ति उस बालक से कहता है कि जो लहरें पानी में उठ रही हैं उनको ध्यान से देखते रहो। वह बालक उन तरंगों को ध्यान से देखने लगता है। कुछ देर बाद वह बालक देखता है कि तरंगें शांत हो रही हैं और पानी स्थिर हो रहा है। अब उसे अपने हाथ पैर और चेहरा पानी में हिलते हुए दिखाई देने लगते है और वह बड़ा खुश होता है। थोड़ी देर बाद वह पानी स्थिर हो जाता है और वह बालक अपने आपको वैसे ही देखने लगता है जैसे उसने अपने आप को पानी में पहली बार देखा था।

 सन्त कबीर उस निराश व्यक्ति से कहते हैं कि यह अवस्था ध्यान है। वह कहते हैं कि तुम भी पानी में पत्थर फैंकते जा रहे हो और इस आशा में बैठे हो कि तू अपने आप को पानी में देख पाओगे। अपने आप को देखने के लिये पहले तुमको अपने हाथों के पत्थरों को फैंकना पड़ेगा और उन लहरों को देखना पड़ेगा जो तुम्हारे मन रूपी पानी में उठ रही हैं।

 इस कहानी में जो पत्थर हैं वह तुम्हारे विचार हैं। पत्थरों को हाथ से फैंकने का अर्थ है ध्यान में बैठ जाना और जो हो रहा है उसे देखना। तालाब का पानी तुम स्वयं हो, तुम्हारा मन है। जब तुम्हारे भीतर विचार प्रवेश करते हैं तो तुम लगातार कुछ सोचने लगते हो। परन्तु जब तुम ध्यान में बैठते हो तो तुम उस समय विचारों को अपने भीतर नहीं आने देते। जो भी विचार हमारे भीतर आते हैं उनकी जानकारी हमारी इंद्रियों से होती है और सबसे ज्यादा जानकारी हम अपनी आंखों से ग्रहण करते है।

 इसलिये ध्यान लगाते समय हम अपनी आंखों को बंद करके बाहर से जानकारी लेना बंद कर लेते हैं। उसके बाद हमारे भीतर जो भी उथल-पुथल हो रही होती है वह हमारे भीतर ही होती है। जब आप ध्यान में बैठ जाते हो तो जो भी उथल-पुथल होती है वह हमारी पुरानी ग्रहण की गई जानकारी से सम्बंधित होती है।

  मान लीजिये एक घड़ा है और उसकी तले में छेद है। आप उसमें पानी डालते-डालते थक जायेगे पर वह कभी भरा हुआ नहीं रहेगा। परन्तु जब आप उसमें पानी डालना बंद कर दोगे तो एक समय ऐसा आएगा कि घड़ा पूरा खाली हो जाएगा।

 जब हम ध्यान में बैठते हैं तो हमारे भीतर भी यही घटना घटित होती है। यदि हम धैर्य के साथ देखें कि किस प्रकार विचार उठते हैं और शांत होते हैं तो आपको अपनी मंज़िल मिल जाएगी।

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