How to control the mind

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The mind acts like an enemy for those who do not control it. Knowing the information in the body of the physical form of the mind, respectively in the body of the earth, water, air, fire and sky and understanding the method of working for the fulfillment of disorders like work, anger, greed, attachment, and ego, respectively by the mind. And only the subtle senses of the mind, the understanding of the mind, the intellect, the mind and the ego (verb) in order to fulfill its resolve, with good judgment, the divine vision opens. And by this sight, the mind starts to appear. Because of which, it feels a bit uncomfortable for the body to dance, and as time passes, the mind comes under the control of meditation.

The flow of this continuous control of the mind becomes steady when practiced day after day, and the mind obtains the faculty of constant consideration.

To process the mind, it is necessary to control its senses. To sex work disorder, Humans need to refrain from focusing on anything other than God. Its best way is to chant the name.

In order to pacify anger, man does not have any hope other than God. Greed ends when knowledge of all things is destroyed except for God.

After having knowledge of the body’s mortality, after knowing the mortal of everything related to this body, the attachment is ended.

If you have the knowledge that you are not a body but a soul and your mind are only doing a lifetime job in order to fulfill the subjects of our learning, then the ego ends.

Control your mind to control your life. Kabir Ji kept his point in front of society as a couplet.

“जब तलक विषयों से ये दिल छूट जाता नहीं,
तब तलक सपने में भी परमात्मा नज़र आता नहीं”

Up to the time, the heart does not break from all the disorders of the mind, till then no one can see the divine in the dream too.

मन का नियंत्रण कैसे

मन के भौतिक स्वरूप के तत्वों क्रमशः पृथ्वी, जल, वायु, अग्नि और आकाश की शरीर में जानकारी को जानने और मन द्वारा अपनी वृत्तियोँ क्रमशः काम, क्रोध,लोभ, मोह और अहंकार से उतपन्न विषय विकारों की पूर्ति के लिये कार्य करने की विधि को समझने व मन की ही सहायक सूक्ष्म इन्द्रियों क्रमशः मन, बुद्धि, चित्त व अहंकार ( क्रिया ) के संयोग से अपने संकल्प को पूरा करने की प्रक्रिया को अच्छे ठंग से समझने के बाद ही मनुष्य की दिव्य दृष्टि खुलती है और इस दृष्टि द्वारा मन दिखाई देने लगता है। जिस कारण वह शरीर को मनचाहा नचाने में थोड़ा असहज महसूस करने लगता है तथा समय बीतने के साथ-साथ मन ध्यान के नियंत्रण में आ जाता है।

मन को समन करने की प्रक्रिया के लिये इसकी इन्द्रियों पर नियंत्रण आवश्यक है। काम विकार को शांत करने के लिये मनुष्य को परमात्मा के सिवाय किसी भी अन्य चीज़ पर ध्यान केंद्रित करना त्यागना जरूरी है। इसका सबसे अच्छा तरीका नाम जप है।

क्रोध को शांत करने के लिये मनुष्य को परमात्मा के सिवाय किसी से भी कोई उम्मीद न रखना होती है। परमात्मा के सिवाय सभी चीजों के नष्ट होने का ज्ञान होने पर लोभ समाप्त होता है।

शरीर के नश्वरता को प्राप्त होने का ज्ञान होने के बाद इस शरीर से सम्बंध रखने वाली हर चीज़ के नश्वर जानने पर मोह समाप्त होता है।

यदि आपको यह ज्ञान है कि आप एक शरीर नहीं बल्कि एक आत्मा हैं तथा आपका मन केवल अपनी वृत्तियों के विषयों को पूरा करने के लिये जीवन भर कार्य कर रहा है, तो अहंकार समाप्त होता है।

कबीर जी ने एक दोहे के रूप में अपनी बात समाज के सामने रखी।

“जब तलक विषयों से ये दिल छूट जाता नहीं,
तब तलक सपने में भी
परमात्मा नज़र आता नहीं”।

 


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