Importance of friendship

Spread the love

Friendship is a precious bond that needs our life and our right too. Therefore, we must always keep ourselves in the bonds of friendship of some true friend. This is the truth of social life. In order to lead a life, there will always be a need for any partner, friend, and friend in society.

Like a writer, his pen is likewise attached to his diary, for example, younger children are attached to their toys in childhood. They talk to them, fight and talk to them. It is just like it behaves with a friend, just like they do with their blooms. Many people are friendly with God, they talk about their heart. They lighten their heart in prayer by expressing their happiness. Faith in God is called friendship with God.

All these things mean that man is a creature that can not live alone. It requires a companion to say the word of your heart, whether it be a person, an animal, an inanimate object or God.

Dohe on Friendship:

मथत मथत माखन रही, दही मही बिलगाव
रहिमन सोई मीत हैं, भीर परे ठहराय”

This means that the curd comes to the head and the butter comes on top of it and yogurt gets merged. Thus, Rahim says that in the same way, a friend also stands with his friend in the time of distress and also holds this problem of butter on his head. The meaning that the companions in trouble are called true friends.

गिरिये परवत शिखर ते, परिये धरनि मंझार

मूरख मित्र न कीजिए, बूडो काली धार”

It seems that if you fall down from the high mountain, even if you fall down on some other road. But why not get any kind of response; you should not seek the help of an incompatible fool friend. It will be similar to a new problem and perspective. That is, friendship in bad company always causes destruction.

The above two Doha, who say Rahim and Kabir with his mouth, tell the true and false personality of a friend. You can not be a friend who can change your face in a difficult situation, only he can ridicule himself. Such friends are always happy to see us in difficult times.

Many examples of friendship also exist in the mythical times such as the friendship of Krishna and Sudama, the friendship of Ram and Sugriva or the friendship of Prithvi Raj Chauhan and Chandravardayee or the friendship of Maharana Pratap and his horse Chetak. All these are proofs that today teach us the true importance and meaning of friendship.

Differences in current and historical friendships:

From all these things it makes sense that a man will always be in need of a friend, he will always need a friend. As a social creature, that friend is incomplete without words. They say that happiness grows by spreading and less than sharing of grief. In order to fulfill this line, we always need a friend.

The definition of friendship is very different today in today’s Kalya Yuga. The first friendship was played till death, and today there is friendship for one month or two months or from one job to another. Betrayal in friendship is a common thing in this Kaliyuga. The same history is full of examples of friendship.

In the past, there was unity in man. All the people lived like a family. All of them were prosperous, but today only a few people are prosperous; most people are below the poverty line. The society was more social, so the friendship was paramount. Trick, deceit, and deception were considered to be a sin with someone. That was why at that time there were no crimes like fraud.


मित्रता का महत्व 

Lord Krishna and Sudama

Hindi Translation-

मित्रता का महत्व बहुत बड़ा होता है। जब भी व्यक्ति किसी अन्य के साथ स्वयं को परिपूर्ण समझता है तो उसके साथ उसकी तकलीफों को भी अपना ही समझता है। वह चाहता है कि वह अपने गम उस व्यक्ति को कह सके। यह जरूरी नहीं कि दोनों में रक्त का संबंध, जातीयता का संबंध या सजीवता का संबंध होना जरूरी है, बल्कि जरूरी यह है कि वह भावनात्मक दृष्टि से उससे जुड़ा हुआ हो। यही मित्रता को मापने के पैमाना है और इसका वास्तविक अर्थ हैं।

जैसे एक राइटर को अपने कलम अपनी डायरी से भी वैसा ही लगाव होता हैं जैसे बचपन में छोटे बच्चो को अपने खिलोने से लगाव होता हैं। वे उनसे बाते करते हैं, लड़ते हैं और बातें करते है। यह ठीक ऐसे ही होता है जैसे किसी मित्र के साथ व्यवहार होता हैं, वैसा ही वो अपने खिलोनो के साथ करते हैं। कई व्यक्ति ईश्वर से मित्रता करते हैं, उनसे अपने दिल की बात कहते हैं। वे प्रार्थना में अपने सुख दुःख कहकर अपना मन हल्का करते हैं। ईश्वर में आस्था ही ईश्वर से मित्रता कहलाती है।

इन सब बातों का मतलब यही हैं कि मनुष्य एक ऐसा प्राणी हैं जो अकेला नहीं रह सकता. उसे अपने दिल की बात कहने के लिए किसी न किसी साथी की जरुरत होती हैं फिर चाहे वो कोई इन्सान हो, जानवर हो, कोई निर्जीव वस्तु हो या फिर भगवान।

मित्रता पर दोहे:

“मथत मथत माखन रही, दही मही बिलगाव

रहिमन सोई मीत हैं, भीर परे ठहराय”

अर्थात दही को मथते- मथते उसके उपर मक्खन आ जाता हैं और दही छांछ में विलय हो जाता हैं। इस प्रकार रहीम कहते हैं कि इसी तरह विपत्तती के समय में एक मित्र भी अपने मित्र के साथ खड़ा होता हैं और उसकी इस मक्खन रूपी समस्या को अपने सर पर भी धारण करता हैं । अर्थता जो विपत्ति में साथ देते हैं वही सच्चे मित्र कहलाते हैं।

“गिरिये परवत शिखर ते, परिये धरनि मंझार

मूरख मित्र न कीजिए, बूडो काली धार”

अर्थात लगे तो ऊंचे पहाड़ से गिर जाओ भले हो गिरकर किसी बीच राह पर फंस जाओ। लेकिन किसी भी तरह की विप्पति क्यूँ न आ जाये आपको किसी असंगत मुर्ख दोस्त की सहायता नहीं लेनी चाहिये। यह एक नयी समस्या और विप्पत्ति के समान होगा। अर्थात बुरी संगती में दोस्ती सदैव विनाश का कारण बनती हैं।

उपरोक्त दो दोहे जो रहीम एवम कबीर ने अपने मुख से कहे, मित्र के सच्चे एवम झूठे व्यक्तित्व को बताते हैं। जो मित्र विकट परिस्थिती में आपने मुँह फैर ले वो आपका मित्र नहीं हो सकता, वो केवल आपका उपहास करने वाला मौकापरस्त व्यक्ति ही कर सकता है। ऐसे दोस्त हमेशा हमें कठिन परेशानी में देख कर खुश होते हैं।

दोस्ती के कई उदाहरण तो पौराणिक काल में भी मिलते हैं जैसे कृष्ण व सुदामा की दोस्ती, राम व सुग्रीव की दोस्ती अथवा पृथ्वी राज चौहान और चन्द्रवरदायी की मित्रता या फिर महाराणा प्रताप और उनके घोड़े चेतक की मित्रता. यह सभी ऐसे प्रमाण हैं जो आज हमें मित्रता का सही महत्व व अर्थ सिखाते हैं।

वर्तमान एवम एतिहासिक मित्रता में अंतर:

इन सभी बातों से यही समझ आता हैं कि मनुष्य किसी भी दौर में चले जाये उसे मित्र की जरुरत हमेशा रहेगी। एक सामाजिक प्राणी के तौर पर वह मित्र शब्द के बिना अधुरा है। कहते हैं सुख बाटने से बढ़ता हैं और दुःख बांटने से कम होता है।इस पंक्ति को चरितार्थ करने के लिए हमें एक मित्र की हमेशा ही जरुरत होती है।

आज के कलयुगी समय में मित्रता की परिभाषा बहुत भिन्न है। पहले दोस्ती होने पर मरते दम तक निभाई जाती थी और आज एक माह दो माह या एक नौकरी से दूसरी नौकरी तक ही दोस्ती रहती है। दोस्ती में विश्वासघात तो मानो इस कलयुग में आम बात हो गई है। वही इतिहास दोस्ती के उदाहरणों से भरा हुआ है।

पहले के समय में मनुष्य में एकता होती थी। सभी लोग कुटुम्ब की तरह रहते थे। वे सभी सम्रद्ध थे पर आज कुछ ही लोग सम्पन्न है ज्यादातर लोग सम्पन्न भी नहीं है। समाज ज्यादा सामाजिक था, इसलिए मित्रता को सर्वोपरी रखता था। किसी के साथ छल,कपट,धोखे को पाप माना जाता था। इसलिए उस समय धोखाधड़ी जैसे अपराध नहीं होते थे।

मित्रता एक अनमोल बंधन हैं जो जीवन में होना हमारी जरुरत है और हमारा हक भी। अतः हमेशा स्वयं को किसी न किसी सच्चे दोस्त की दोस्ती के बंधन में जरुर बंधना चाहिये। यही एक सामाजिक जीवन का सत्य है। जीवन व्यतीत करने के लिये समाज में किसी साथी, दोस्त, सखा की जरूरत हमेशा रहेगी।

...............ओम सत्य साहिब................

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *