Kabir Butt Tree

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In the state of Gujarat, there is a city named Bharuch along the river Narmada. On there, King Baliraja performed ninty nine Ashvmegha yagna then Lord Baaman went  and pleaded there. The same place is also called Shukla Tirtha. There were two streams of Narmada river, and they were further reunited. The island was left in the middle. In the same city of Bharuch, two Brahmins called Tvacha and Jiva, they were rich and devout. Often they used to be stocked there. Dwarikapuri is near from this place. The pilgrims coming from there often used to come to the reservoir and received great respect.

Once Tvacha thought to have any Master. They buried a big wood in the ground and wait for any Mahatma  to come there. He planned to wash Mahatma’s feet. So he put the water in the big tree hole. He decided that the water of whose feet would become green , he would make him his master.

Twelve years passed, but the water did not become green. He stopped worshiping the saints, and lost his faith with such people completely. Some saintly people came to Kabir and told all things.

In the morning, everybody can get themselves in Bharuch. All the saints became scared, as soon as they saw Kabir  there, they went and started asking for blessing of holding their feet. Going to a saint and talking to Tvacha, a sadhu has come and said, wash their feet and put them in the wood. If wood becomes green, then treat them as a monk.

Then Tvacha ji filled the water in a lotto went to Kabir, washed his feet and put the water in the wood. As soon as the water started pouring out of the woods, green pebbles started and the wood started to grow too large. In a while, it became a wood tree and there have also been a lot of green leaves in it. Seeing this, Tvacha and his brother fell at the feet of Kabir and took a message of “Satynaam” by becoming a disciple. He used to make various types of food for Kabir, but Kabir said, “This is not my diet. My diet is only “Satynaam”, and by saying this, we reached the place of meditation.

 At present time I also famous that place is Kabir Butt. There is a fair two months in the month of Kartik and Baisakh, many saints come to Mahatma, Bhandara seems to be there.   Those people who go to see that butter tree and find charanamrit, the sins of their births and their births are over, and they get great fulfillment.   

Life to Kamaal and Kamali by Kabir


   हिंदी अनुवाद — 

 गुजरात राज्य मे नर्मदा नदी के किनारे भरूच नाम का शहर है।वहां पर बलिराजा ने निन्यानवे अश्वमेघ यज्ञ किये तो बामन भगवान ने वहां जाकर याचना करी। उसी जगह को शुक्ल तीर्थ भी कहते हैं। वहाँ नर्मदा नदी की दो धारायें हो गयीं ओर आगे चलकर फिर एक हो गयीं। बीच मे द्वीप सा रह गया। उसी भरूच शहर मे त्वचा और जीवा नाम के दो ब्राह्मण थे, वे बड़े अमीर और भक्ति वाले थे। अक्सर उनके वहाँ भंडारा लगता था।वहाँ से द्वारिकापुरी नज़दीक है। वहाँ से आने वाले श्रद्धालु अक्सर  भंडारे मे आते और काफी सम्मान पाते थे।

त्वचा जी के मन मे आया कि गुरु कर लेना चाहिये। उन्होंने एक बड़ की लकड़ी को जमीन मे गाड़ दिया और जो भी साधू महात्मा उनके भंडारे मैं आता, वे उसके चरण धोकर पानी को बड़ के पेड़ में डाल देते। वो चाहते थे कि जिसके चरण के पानी से लकड़ी हरी हो जाएगी, उसी को अपना गुरु बना लेंगे।

ऐसा करते करते बारह वर्ष बीत गये पर लकड़ी हरी न हुई। उन्होंने साधू महात्माओं की भक्ति करना छोड़ दिया और पूरे  देश के साधू महात्माओं से उनका विस्वास हट गया। कुछ साधू लोग छह माह तक पैदल चलकर कबीर के पास आये और बोले बड़े थके ओर दुखी हैं। कबीर बोले पहले भोजन कर लीजिये ओर विश्राम करिये, कल बात करेंगे। सुबह होने पर सब लोग अपने को भरूच मे पाते है।सारे संत खुस हो गए, जैसे ही उनको वहाँ कबीर साहिब दिखाई दिये, वे जाकर उनके चरण पकड़ के आशीर्वाद मांगने लगे।  एक साधू जाकर तत्वा जी के पास जाकर बोला एक साधू आये है आप उनके चरण धोकर लकड़ी मे डालिये। अगर लकड़ी हरी हो जाएगी तो उनको साधू मान लेना। तब तत्वा जी एक लोटे मे पानी भरकर कबीर के पास गया, उनके चरण धोये ओर पानी लकड़ी में डाल दिया। पानी डालते ही लकड़ी मे से हरी कोपलें निकलने लगी और लकड़ी बड़ी भी होने लगी । थोड़ी देर मे वह लकड़ी पेड़ बन गयी और उसमें काफी सारे हरे पत्ते भी आ गए। यह देखकर तत्वा ओर उनके भाई कबीर के चरणों मे गिर गये ओर चेला बनकर सत्यनाम का उपदेश लिया। उन्होंने कबीर के लिए नाना प्रकार के भोजन बनवाये पर कबीर बोले यह मेरा आहार नहीं है मेरा आहार तो केवल सत्यनाम है, ओर ऐसा कहकर अंतर्ध्यान होकर कासी पहुँच गये।

वर्तमान समय मैं भी वह स्थान कबीर बट नाम से प्रसिद्ध है। वहां साल मे दो बार कार्तिक ओर बैसाख माह मे मेला लगता है, बहुत सारे संत महात्मा आते है, भंडारा लगता है। जो लोग जाकर उस बट बृक्ष का दर्शन करते है और चरणामृत पाते है उनके जन्म जन्मान्तरों के पाप खत्म हो जाते हैं, और  उनको बड़ा पूण्य मिलता है।                  

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