Kabir v/s Emperor Sikandar Dialogue

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King Sikandar Lodhi of Delhi was suffering from irritation, thousands of Vaidya, Hakim, Doctor, Maulvi, Fakir, Kazi and Pir were defeated to remove the disease but could not overcome the disease. In the king’s mind, I came to think of meeting with the famous Hindu mystic, and thought that my illness would be cured by meeting them. With this thought, King took the  army and reached Delhi from Kasi Nagar. On the bank of the river Ganges was the halt of the army. The King himself went to see the Mahatmas. The minister was also with the King. Some of the people there also walked with them. Tell the king, go to good fakir. Swami Ramanand was a great honor, and everyone came to his court. Ramanandji was sitting; the king of the king descended from his palace and went inside the temple. Ramanand ji looked at King Sikandar Lodhi and turned his face to the other side. The king came in great anger and he cut off Ramanand’s head with his sword. Ramanand’s foreshadowed the fad. From the side of the white stream and the side of the fuselage flowed out of red blood. The sadhus, who lived in the ashram, began to shout, crying. People from a city began to feel alarmed that after coming, there is no such a gun? The emperor got unconscious after cutting the head of Ramanand. The people took the side of the palace and took them towards the house. When the emperor got the senses, he said, in the night, the mystic that had written fourteen texts, take it to him. Where is Kabir? People said that Varuna remains in the cave along the river Ganges on the Sangam.King Sikandar Lodhi reached there in the boat, reached the cave and entered the cave, along with all the soldiers who came together. There was a three-foot door, only five men had the place to sit. When the king entered, his head crashed into the door and he fell down and reached the feet of Kabir on his feet. Kabir kept his hand on the head and said, keep calm. After resting your hands, my irritation of the disease has been cured. I was blessed. Have received health care from your blessings, speak what you want. Kabir said that all our wishes are over, we do not even worry and our mind does not even care. We do not want anything from you.

Ramanand ji’s disciples came running along and said to Kabir that you are sitting here and on the other side Ramanand ji’s head has become furious and they have died.Let’s go and see, 1484 disciples are crying, all are sad. Kabir The body of the said master is never known. Well let’s go and see. From there we reached the temple. , Kabir stopped the king at the door of the temple because Ramanand did not even like to see the mouth of the Muslims, and himself went to the temple, saw Ramanand ji’s head is separate from the fuselage and from the side of the white stream and from the torso The red stream is coming out. Kabir Ji said, leave the body, where is the soul. People said that finding them is not ours, they can tell you too. Kabir spoke in the north direction; there is a large bunch of rose flowers, in that bush break the large rose flower looking towards north direction. A saint brings a break of flowers. Kabir said, “Look, this is the subtle form of Lord Swaminarayan. My words of faith were not in their interiors; otherwise their neck was not cut. Due to little trust, it turned white. Well, join the head and the fuselage and roll the sheet. Then Kabir said, Raise up Guruji and Swami Ramanand Ram Rama stood up and sat and said Kabir Kabir, Kabir started saying, people also started taking Kabir Kabir’s voice. After you say, your leela is unrestrained, folded the head and torso and made alive? It was a great surprise; the man had never seen such a thing before. It is said that this fakir is new to God. Departure demand from Kabir went to his house. Kabir went to his cave. This incident took place in May 1500.

Kabir’s Bhandara


दिल्ली के राजा सिकंदर लोधी को जलन की बीमारी थी, बीमारी को दूर करने मे हज़ारों वैद्य, हकीम, डॉक्टर, मौलवी, फकीर, काज़ी, पीर सब हार गए पर राजा की बीमारी दूर नहीं कर पाये। राजा के दिमाक में कासी जाकर नामी हिन्दू फकीर से मिलने का ख्याल आया, और सोचा सायद उनसे मिलकर मेरी बीमारी ठीक हो जाये। ऐसा विचार करके राजा अपनी फौजी सेना लेकर दिल्ली से कासी नगरी पहुँचा। गंगा नदी के किनारे सेना का पड़ाव था। महात्माओं का दर्शन करने के लिए राजा खुद चल पड़ा। मंत्री भी साथ थे।तलवार बंदूक लिए चपरासी भी साथ थे। वहां के काज़ी लोग भी उनके साथ चले। राजा बोला अच्छे फकीर के पास चलो। स्वामी रामानंद जी बड़े प्रतापी फकीर  थे, सब उन्हीं के दरबार मे पहुंच गये। रामानंद जी बैठे थे, बादशाह राजा अपनी पालकी से उतरकर मंदिर के अंदर चले गये। रामानंद जी ने राजा सिकंदर लोधी को देखकर दूसरी ओर मुँह फेर लिया। राजा को बड़ा क्रोध आया और उन्होंने अपनी तलवार से रामानंद का सर काट दिया। रामानंद का सर धड़ से अगल हो गया। सर की तरफ से सफेद रंग की धारा ओर धड़ की तरफ से लाल खून की धारा निकल पड़ी। आश्रम मे रहने वाले साधू संत लोग रोने चिल्लाने लगे।कासी नगरी के लोग घबराने लगे कि बादसाह आया है कहीं तोप न लगा दे ? बादशाह को रामानंद जी का सर काटने के बाद बेहोसी आ गयी।लोग पालकी में बैठाकर आवास की ओर ले गये।जब बादशाह को होश आया तो बोले एक रात में जिस फकीर ने चौदह ग्रंथ लिख दिए थे, उसके पास ले चलो।पता लगाया गया कि कबीर कहाँ है ? लोगों ने बताया वरुणा संगम पर गंगा नदी के किनारे गुफा में रहते हैं।नाव में बैठकर राजा सिकंदर लोधी वहाँ पहुंचे, गुफा के पास पहुंचकर गुफा में प्रवेश किया, साथ मे जितने सैनिक थे, वे भी पहुंचे। तीन फुट का दरवाजा था, सिर्फ पाँच आदमियों के बैठने की जगह थीं। बादशाह अंदर गए तो उनका सर दरवाजे से टकरा गया और वे गिरकर सिर के बल सीधे कबीर के पैरों में पहुँचे। कबीर ने सिर पर हाथ रख दिया और बोले शांत रहो।बादसाह बोला आपके हाथ रखने से ही मेरी जलन की बीमारी ठीक हो गयी। मैं धन्य हो गया। आपके आशिर्वाद से आरोग्य दान पाया है बोलिये आपको क्या चाहिए। कबीर बोले हमारी सारी चाहें खत्म हो गयी है हम चिंता भी नहीं करते और हमारा मन भी परवाह नही करता। हमको आपसे कुछ नहीं चाहिए।

इतने मे रामानंद जी के चेले दौड़ते हुए आये और कबीर से बोले आप यहां बैठे है और उधर रामानंद जी का सर धड़ से अगल हो गया है और वे मर गए हैं।चलिए चलिए जरा देखिये, 1484 चेले रो रहे हैं सब दुखी हैं।कबीर बोले  गुरु का शरीर कभी नही जाता। अच्छा चलिए चल कर देखते है। वहाँ से मंदिर में पहुँचे। कबीर ने बादशाह को मंदिर के दरवाजे पर ही रोक दिया क्योंकि रामानंद जी मुसलमानों का मुंह भी देखना पसंद नही करते थे, और खुद मंदिर में चले गए, देखा रामानंद जी का सर धड़ से अलग है और सर की तरफ से सफेद धारा ओर धड़ से लाल धारा निकल रही है। कबीर जी बोले शरीर को छोड़ो ,आत्मा कहाँ है। लोग बोले उसको ढूंढना हमारे वस की बात नहीँ, वो तो आपही बता सकते है। कबीर बोले उत्तर दिशा मे वहाँ पर गुलाब के फूलों की एक बड़ी झाड़ी है, उस झाड़ी में उत्तर दिशा की तरफ लग रहे बड़े गुलाब के फूल को तोड़ लाओ। एक संत फूल तोड़ लाये। कबीर ने कहा देखो ये स्वामी जी का सूक्ष्म रूप जीव है। मेरे वचनों का विस्वास इनके अन्तःकरण मे नही था वरना इनकी गर्दन कटती ही नही। थोड़ा सा विस्वास होने के कारण यह सफेद धारा निकली। अच्छा चलो सर ओर धड़ को जोड़ दो और चादर ओढ़ा दो। तब कबीर बोले उठिए गुरुजी ओर स्वामी रामानंद राम राम कहते हुए उठकर बैठ गये ओर धन्य कबीर कबीर कहने लगे, लोग भी कबीर कबीर की आवाज़ निकालने लगे। बादसाह बोला आपकी लीला अपरंपार है कटे हुए सिर और धड़ को जोड़ दिया और ज़िंदा कर दिया ? ये तो बहुत बड़ा आश्चर्य हो गया, मैन ऐसा पहले कभी नही देखा।बोले यह फकीर खुदा का नवी है। कबीर से विदा मांग अपने आवास को चला गया।कबीर अपनी गुफा में चले गये। यह घटना मई माह सन 1500 मैं हुई थी।

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