lords-vision

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A king was very fair, religious and so much careful about his people of the kingdom. He used to help the poor, the afflicted, orphans and the handicapped people. Therefore seeing his humanity, Lord came to his palace to appear him. He also began to plead, You are my dearest devotee and I am very happy with your kindness. If you have any desire, tell me?

He was amazed to see Lord in front of him. He bowed down and said that you are in my palace, so I am very grateful to you. He sat in the throne and prayed him.

The King said I do not want anything from you. I have everything with your mercy and the people of my state are also prosperous and happy. Lord said, such an opportunity don’t get every devotee. You are lucky. The king said “As you wish” I want you to just give the glimpse to the people of my kingdom too.

The God said that I am not able to fulfill your demand. He explained very much that I only appeared to him whom I pleased with. But the king loved his people very much. He began to insist the Lord and then he accepted his request.

If you want to do so, then come to that hill with all your people tomorrow. I will give a glimpse to everyone there. The king was very pleased to hear the voice. He sent information to all the people to reach the hill accordingly and also inform that the Lord would present themselves to everybody.

On the second day, the king proceeded toward the hill with his queen along with all the peoples. On the way, people saw a mountain of copper coins in one place. Some people started going to the side. Seeing the people, the king said that no one should pay attention to that place because you will see the Lord in front of you. Do not kick your fate behind this wealth.

Ignoring the instructions, some people walked there and collected a lot of coins and moved back to his house. King was very sad to see those greedy people. A few steps away, the mountain of silver coins appeared. This time too, again a few people ran away towards the coin and made silver coins bundle and headed towards their home. There was a thought in their mind that such an opportunity does not get repeated. So many coins of silver cannot be met again. We may find God some other day.

In the same way, a few miles away and the gold coins are visible. Now the rest of the people were running away. They also used to carry coins like bundles to their homes. Now only the king and the queen were left. He said how many covetous people are all these. They don’t know the importance of God. What is the wealth of the whole world in front of him? The Queen supported the king’s point of view and started moving forward.

After some distance, the king and the queen saw the hill of diamonds. The Queen’s eyes were open to the open. She did not stay away from it and started to raise diamonds. Queen got lots of diamonds when her mind was not filled; she also tied diamonds in her saree too. Due to the weight of diamonds, the saree of the queen separated from the body, but the craving of diamonds did not end. Seeing this, the king was very worried. The King alone proceeded with a big sad mind.

There literally the Lord stood to wait for him. Seeing the King Lord smile and asking where are your people and your loved ones I am waiting to meet him since then. “The king bowed his head due to shame.

Then God told the king that O devotee, those who believe in material worldly achievement above me, are probably not acquainted with me and they remain deprived of my affection and aristocracy.

Unique Patience


Hindi Translation-

एक राजा जो बहुत न्यायप्रिय,धार्मिक तथा अपनी प्रजा का बहुत ध्यान रखने वाला था। वह महल में आने वाले गरीब, पीड़ित, अनाथों ओर विकलांगों की खूब सहायता करता था। उसकी मानवता देखकर ईस्वर उसके महल में आये और राजा से प्रसन्न होकर कहने लगे, मैं तुमसे बहूत खुश हूँ।तुम्हारी कोई इच्छा है तो बताओ।

राजा ने ईस्वर को अपने सामने देखकर आश्चर्यचकित हो गया। उसने उनको प्रणाम किया। वह कहने लगा आप मेरे महल में पधारे इसलिये मैं आपका बहुत आभारी हूँ। उसने ईस्वर को अपने सिंहासन में बैठाया और उनकी आरती उतारी।

राजा ने कहा मुझे आपसे कुछ नहीं चाहिए। आपकी कृपा से मेरे राज्य में खुशहाली है। ईस्वर ने कहा मैं तुमसे बहुत प्रसन्न हूँ इसलिये मैं चाहता हूं कि तुम मेरे से कोई वरदान मांगो। राजा ने कहा प्रभू जैसी आपकी इच्छा। आप चाहते ही है तो मैं चाहता हूं कि जैसे आपने मुझे दर्शन दिये है, वैसे ही मेरी प्रजा को भी एक बार दर्शन दे दीजिये।

ईस्वर कहने लगे है राजा आपकी यह मांग पूरी करना सम्भव नहीं है। उन्होंने राजा को बहुत समझाया कि मैं केवल उसी को दर्शन देता हूँ जिससे मैं प्रसन्न होता हूँ। परन्तु राजा अपनी प्रजा से बहुत प्यार करता था। वह ईस्वर से जिद्द् करने लगा कि आप मेरी विनती स्वीकार करें।

ईस्वर ने कहा तुम ऐसा ही चाहते हो तो कल अपनी सारी प्रजा को लेकर उस पहाडी पर आना। मैं वहां सबको दर्शन दूँगा। ईस्वर की बात सुनकर  राजा बहुत प्रसन्न हुअा। उसने सारे नगर मे सूचना  भिजवा दी कि कल प्रजा के सभी लोग पहाड पर पहुँचे, वहाँ खुद ईस्वर सबको दर्शन देगें।

दूसरे दिन राजा अपनी रानी और सारी प्रजा के साथ पहाड़ी की ओर चल दिया। चलते-चलते एक स्थान पर तांबे के सिक्कों का पहाड दिखा। प्रजा में से कुछ लोग एक उस तरफ जाने लगे। लोगों को वहाँ जाता देख राजा ने कहा कि कोई उस ओर ध्यान न दे क्योकि तुम सब भगवान के दर्शन करने जा रहे हो। इन तांबे के सिक्कों के पीछे अपने भाग्य को लात मत मारो।

राजा की बातों की अनदेखी करके कुछ लोग उस पहाड़ी की ओर भागने लगे। उन्होंने खूब सारे सिक्के बटोरे और वापस अपने घर चल दिये।राजा को उन लालची लोगों को देखकर बहुत दुख हुआ। कुछ दूर चलने पर चांदी के सिक्कों का पहाड दिखाई दिया। इस बार भी बचे प्रजा में से बचे कुछ लोग उस ओर भागने लगे ओर चांदी के सिक्कों को गठरी बनाकर अपनी घर की ओर चल दिये। उनके मन मे विचार चल रहा था कि ऐसा मौका बार-बार नहीं मिलता है। चांदी के इतने सारे सिक्के फिर मिले न मिले, भगवान तो फिर किसी और दिन मिल जायेगें।

इसी प्रकार कुछ दूर और चलने पर सोने के सिक्कों का पहाड नजर आया। अब तो प्रजाजनो में बचे हुये सारे लोग उस ओर भागने लगे। वे भी दूसरों की तरह सिक्कों कि गठरी लाद कर अपने-अपने घरों की ओर चल दिये। अब केवल राजा ओर रानी ही शेष रह गये थे। राजा ने रानी से कहा कि देखो कितने लोभी लोग हैं ये सब। भगवान से मिलने का महत्व ही नहीं जानते हैं। भगवान के सामने सारी दुनिया कि दौलत क्या चीज है? रानी ने राजा की बात का समर्थन किया और वह आगे बढने लगे।

कुछ दुर चलने पर राजा ओर रानी को हीरों का पहाड दिखाई दिया। रानी की आंखें खुली की खुली रह गयीं। उससे रहा नहीं गया ओर वह हीरों को उठाने चल पडी। रानी ने खूब सारे हीरे बटोरे। जब उसका मन नहीं भरा तो उसने अपनी साड़ी में भी हेरे बांध लिये। हीरों के वजन के कारण रानी के वस्त्र देह से अलग हो गये परंतु हीरों का तृष्णा नहीं मिटी। यह देख राजा को अत्यन्त ग्लानि  हुई। बड़े दुःखद मन से राजा अकेले ही आगे बढते गये।

वहाँ सचमुच भगवान खडे उसका इन्तजार कर रहे थे। राजा को देखते ही भगवान मुसकुराये ओर पुछा कहाँ है तुम्हारी प्रजा और तुम्हारे प्रियजन। मैं तो कब से उनसे मिलने का इन्तजार कर रहा हूॅ।” राजा ने शर्म के कारण अपना सर झुका लिया।

तब भगवान ने राजा को कहा कि हे राजन जो लोग भौतिक सांसारिक प्राप्ति को मुझसे अधिक मानते हॆ, उन्हें कदाचित मेरी प्राप्ति नहीं होती ओर वह मेरे स्नेह तथा आर्शिवाद से भी वंचित रह जाते हॆ।

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