Meditation power

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In meditation, the divine power (soul) resides in all the living beings of this world equally. When the teacher or religious teacher is teaching the followers, the followers present at that time are looking in front of them in the eyes and listening and understanding their things.

Sometimes you will notice that if the meditation goes away somewhere else, even sitting in front of them, we will not be able to listen to them or understand them. Even we will not even see it.

The focus is really a big thing. It means that the power of hearing, understanding and seeing us was getting attentively. While our eyes and ears were open and our brain was working properly. How important is it, we have never paid attention to it? It is not that we do not know this thing from some angle. We also tell our children that reading carefully, walking carefully, taking care of your health, etc.

All the world’s religions are pointing to concentrating meditation. Saying to concentrate on meditation. Only by concentrating meditation can God be reached. Through the physical parts of the body, we can not see God.

The way we do an agricultural undertaking to get food i.e. we take the farm. Then after planting the seed, after irrigating it irrigated and makes it worth producing, then we get food. Similarly, we can get God through meditation mode.

The question arises whether there is no such undertaking other than the meditation program, that we can attain God? The answer is no where we get it, because there is no alternative other than that.

If you explain the meditation then whatever functions are capable of doing the physical organs of our body, meditation does not require any organ to do those actions. Without eyes, eyes can see, without ears can hear, without hands can walk feet, etc. If you notice, then this soul will be seen in all beings.

In Bhagwat Geeta, Shri Krishna preaches Arjun and says that “O Arjun” can not be the eyes of this soul, yet it can see it in all directions. Not the feet of this soul, yet they can move in all directions. The ears of this soul can hear from all directions even then. Sri Krishna, who is talking about the organs of the soul, is implementing the body parts. As the eyes of the soul behind the eyes of the eyes are showing us the scene. The feet of the soul are running this body etc. As soon as the soul emerges from the body, all the organs of our body stop working.

This topic is very complex. Whenever we try to remove our soul from our body then our mind stops obstacles. Because of which the soul can not concentrate i.e. one place can not be gathered. It has been said to concentrate meditation in simple language. To coordinate this meditation, the sage & Munis have done a lot of penance. It is possible to attain God only after attaining concentration.

 

ध्यान शक्ति

ध्यान रूपी ईश्वरीय शक्ति (आत्मा) इस जगत के समस्त जीवों में समान रूप से निवास करती है। जब अध्यापक या धर्मगुरु अनुयायियों को शिक्षा दे रहा होता है तो उस समय मौजूद अनुयायी उन्हें आंखों के सामने देख रहे होते हैं तथा उनकी बातों को सुन और समझ रहे होते हैं।

कभी आप गौर करना इस अवस्था में यदि ध्यान कहीं और चला जाये तो उनके सामने बैठकर भी हम ना तो उनकी बातों को सुन पाएंगे और ना ही समझ पाएंगे। यहाँ तक कि हमें वह दिखाई भी नहीं देंगे।

ध्यान बड़ी खास चीज़ है। इसका मतलब ये है कि हमको सुनने, समझने और देखने की शक्ति ध्यान से प्राप्त हो रही थी।

जबकि हमारी आंखें और कान खुले थे और हमारा दिमाग भी ठीक ढंग से काम कर रहा था। यह कितना महत्वपूर्ण है, हमने कभी इस ओर ध्यान नहीं दिया? ऐसा नहीं है कि हम किसी न किसी कोण से इस बात को जानते नहीं हैं। हम अपने बच्चों से भी कहते हैं कि ध्यान से पढ़ना, ध्यान से चलना, अपनी सेहत का ध्यान रखना इत्यादि।

दुनिया के जितने भी धर्म शास्त्र हैं वे सभी ध्यान को एकाग्र करने की ओर इशारा कर रहे हैं। ध्यान को एकाग्र करने को कह रहे हैं। ध्यान को एकाग्र करके ही परमात्मा तक पहुंचा जा सकता है। शरीर के भौतिक अंगों के माध्यम से हम परमात्मा को नहीं देख सकते।

जिस प्रकार अन्न को पाने के लिये हम कृषि का एक उपक्रम करते हैं यानि हम खेत को जोतते हैं। फिर बीज लगाकर उसके उगने के बाद सिंचाई करके उसे फल देने लायक बनाते हैं तब हमको अन्न प्राप्त होता है। इसी प्रकार ध्यान रूपी उपक्रम से हम परमात्मा को पा सकते हैं।

प्रश्न खड़ा होता है कि क्या ध्यान रूपी उपक्रम के सिवाय अन्य ऐसा कोई उपक्रम नहीं है जिससे हम परमात्मा को पा सकें?  इसका उत्तर हमको कहीं नहीं प्राप्त होता है क्योंकि इसके अलावा अन्य कोई विकल्प है ही नहीं।

ध्यान की यदि व्याख्या करें तो जितने कार्य हमारे शरीर के भौतिक अंग कर सकने में सक्षम हैं, उन कार्यों को करने के लिये ध्यान को किसी अंग की आवश्यकता नहीं है। ध्यान बगैर आँखों के देख सकता है, बगैर कानों के सुन सकता है, बगैर हाथ पैरों के चल सकता है इत्यादि। यदि आप गौर करें तो यह आत्मा आपको सभी प्राणियों में दिखाई देगी।

भागवत गीता में श्री कृष्ण अर्जुन को उपदेश देते हुए कहते हैं कि “ हे अर्जुन “ इस आत्मा की आंखें नहीं फिर भी यह सभी दिशाओं में देख सकती हैं। इस आत्मा के पैर नहीं फिर भी ये सभी दिशाओं में चल सकती हैं। इस आत्मा के कान नहीं फिर भी सभी दिशाओं से सुन सकती हैं। श्री कृष्ण जिस आत्मा के अंगों की बात कर रहे हैं वे अंग शरीर के अंगों का क्रियान्वयन कर रहे हैं। जैसे शरीर की आँखों के पीछे आत्मा की आंखें हमको दृश्य दिखा रही हैं। आत्मा के पैर इस शरीर को चला रहे हैं इत्यादि। जैसे ही आत्मा शरीर से निकलती है हमारे शरीर के सारे अंग काम करना बंद कर देते हैं।

यह विषय बड़ा जटिल है। जब भी हम अपनी आत्मा को अपने शरीर से निकालने का प्रयास करते हैं तो हमारा मन रुकावट खड़ी कर देता है। जिस कारण आत्मा एकाग्र नहीं हो पाती यानी एक जगह इकट्ठा नहीं हो पा रही है। इसे सरल भाषा में ध्यान को एकाग्रचित्त करना कहा गया है। इसी ध्यान को एकाग्र करने के लिये ऋषि मुनियों ने घोर तपस्या की हैं। ध्यान एकाग्र हो जाने पर ही परमात्मा को पाना सम्भव है।

 
 


 
 

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