Meditation Power

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Once Saint Kabir was preaching to the devotees. One of them a Curious disciple asked Kabir that everyone asks to meditate. I do a lot of meditation but I do not get attention anytime. Something is missing in between and my meditation breaks frequently. Can we not get self-realization without meditation?

Kabir said, sit down. After the passage is over, your question will be answered. He called the other disciple sitting beside the person and teach something slowly in his ear. They told him to do the same as he has guided and started preaching.

All the people started listening to their teachings carefully. After preaching, he asked the inquisitive disciple whether you listened to my objectives or not?

Curious said, when you were preaching, I was listening to you with a lot of attention. But in the midst of listening to the teachings, the person sitting next to me reminded me of some important work, which left my attention away from you. So I did not understand the whole thing.

Kabir said that everyone heard and understood all my teachings. But you can not hear my teachings even sitting here. Do you know why this happened? The person started saying that this problem prevented me from meditating again and again.

Kabir began to say that maybe you will never have noticed but it is true. You have more power than your body parts in your meditation. You were sitting in front of me, even after your eyes, ears, and hearts were open, neither you could see me, nor hear nor understand. Because at that time your attention went somewhere else.

It meant that you had the power of meditation behind the functions of your body, due to which you were seeing, listening and understanding me. But your attention was not here, so even if you were sitting here, you were not here.

This is the reason that all theology is asking for meditation. In meditation, there is the ability to attain ego because it is a part of the soul. Without collecting meditation you will never be able to receive the power of God. Your attention is your soul. Chanting, fasting, worship, Aradas, Namaz are all created for gathering meditation so that the realization can be made easier.

Kabir says: “जाकी सुरति लाग रह जहवाँ, कह कबीर पहुंचाऊं तहवाँ”

For the moment where his attention goes, he also reaches there.

Child’s Insistence

Hindi Translation-

एक बार संत कबीर भक्तों के साथ प्रवचन कर रहे थे। एक व्यक्ति ने पूछा कि सभी लोग ध्यान लगाने को कहते है लेकिन ध्यान लगता ही नहीं। बीच में कोई न कोई बात याद आ जाती है और बार बार ध्यान टूट जाता है। क्या बिना ध्यान लगाये हम ईस्वर को प्राप्त नहीं कर सकते?

कबीर ने कहा कि बैठ जाओ।  प्रबचन समाप्त होने के बाद तुम्हारे प्रश्न का उत्तर मिलेगा। उन्होंने प्रश्न पूछने वाले व्यक्ति के बगल में बैठे दूसरे शिष्य को अपने पास बुलाया और धीरे से कुछ कहने लगे। उन्होंने उससे कहा कि जैसा मैंने कहा है वैसा ही करना और उपदेश देने लगे।

सभी लोग उनके उपदेशों को ध्यानपूर्वक सुनने लगे। उपदेश देने के बाद उन्होंने जिज्ञासू शिष्य से पूछा कि क्या तुमने मेरे उद्देश्यों को पूरा सुना या नहीं ?

जिज्ञासू बोला, जब आप उपदेश दे रहे थे तो मैं आपको बड़े ध्यान से सुन रहा था। लेकिन उपदेशों को सुनने के मध्य में ही मेरे बगल में बैठे व्यक्ति ने मुझे कुछ याद दिला दिया, जिससे मेरा ध्यान आपकी बातों से हट गया। इसलिए मुझे पूरी बात समझ नहीं आयी।

कबीर ने कहा कि मेरे उपदेशों को सबने सुना और समझा भी। किंतु तुम यहाँ बैठकर भी मेरे उपदेश नहीं सुन पाये।  जानते हो ऐसा क्यों हुआ?। वह व्यक्ति कहने लगा कि यही समस्या मुझे ध्यान लगाने से बार बार रोकती है।

कबीर कहने लगे कि शायद तुमने कभी गौर नहीं किया होगा लेकिन यह सत्य है। तुम्हारे ध्यान में तुम्हारे शरीर के अंगों से भी ज्यादा शक्ति है। तुम मेरे सामने बैठे थे, तुम्हारी आंखें, कान और दीमाग खुले होने के बाद भी न तो तुम मुझे देख सके, न सुन सके और न ही समझ सके। क्योंकि उस समय तुम्हारा ध्यान कहीं और चला गया था।

इसका मतलब तुम्हारे शरीर के अंगों के कार्य करने के पीछे ध्यान की शक्ति थी जिसकी वजह से तुम मुझे देख रहे थे, सुन रहे थे और समझ भी रहे थे। लेकिन तुम्हारा ध्यान यहां नहीं था इसलिये यहां बैठे होने पर भी तुम यहां नहीं थे।

यही कारण है कि सभी धर्मशास्त्र ध्यान लगाने को कह रहे हैं। ध्यान में ईस्वर को प्राप्त करने की क्षमता है क्योंकि यह ईस्वर का अंश है।ध्यान को इकट्ठा किये बिना तुम कभी भी ईस्वर को प्राप्त नहीं कर पाओगे। तुम्हारा ध्यान ही तुम्हारी आत्मा है। जप, तप, व्रत, पूजा, अरदास, नमाज़ ये सभी साधन ध्यान को एकत्रित करने के लिए बनाये गये हैं ताकि ईस्वर प्राप्ति आसान हो सके।

कबीर कहते हैं-

“जाकी सुरति लाग रह जहवाँ, कह कबीर पहुंचाऊं तहवाँ”

जिसका ध्यान जहां जाता है उस पल के लिये वह भी वहीं चले जाता है।

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