Obstacle in searching for God

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Thought Generator

We worship by means of “Saguna or Nirguna devotion” to search for God. Whatever our soul wants to discover the ultimate element. How do we achieve that ultimate element? Because there are so many obstacles existing in searching for God.

Kabir Ji said about the ultimate element that he is not going to hurt anyone. He is neither born nor has he ever died. He is neither a man nor a woman, He has no gender. Whereas there are four forms of Munn (The generator of thought).

When the Munn decides, it is called wisdom. When it remembers it is called Chitta (Memory). When this action takes place then it is called ego and when it resolves, it is called Munn. Whatever we see from these physical eyes, we get into our mind. Whatever actions we have taken in our life, whatever actions we have done, we have got stored in our memory. Sometimes the Munn reminds us of what we do not want to remember. Such memories start coming in trouble. It means that the Munn is not in control.

Similarly, the work of brain is to make decisions. But sometimes the intellect also makes unfair decisions, after which we also repent. If a man is going to kill someone, then this too will be called his own decision because he has decided to murder. Anyone stealing, killing someone, giving abusive behavior, etc. Whatever decision he makes takes on all those disorders. It is only a matter of peace to go to the unrest. This means that all decisions of intelligence are not correct.

There must have been many such occasions in the lives of all of us when we have repented. It means that intelligence is not under our control. Someone is compelling to take this wrong decision.

Similarly, the Munn also resolves. The Munn has to take a resolution due to the desires of the body. We do such desires many times and later think that why did we desire this? Similarly, there is ego which makes us  feel like I am and we keep doing physical actions. As the Munn resolves, whatever it is right or inappropriate, the body has to act in order to reach its conclusion. This means that our body is forced to accept the resolution.

Kabir Ji said that these strengths are very powerful. Even the man is not able to get rid of them. They are not able to escape from them and these powers are dancing to us.

We see that when Monky comes in the hand of Madari, first its independence is snatched. Similarly, our soul is also caught in the cover of this Munn. Sometimes we see this world as a big deception. The man rests his house by working tirelessly and suddenly one day he has to leave everything. Is this system okay? Altogether, the faults are seen in this system. We all are looking for permanent joy and happiness in this world but they do not get it. Like antelope, we also strive.

Deer in the desert sees water on the horizon, where the earth and the sky appear to meet him. Due to heat, He sees the glow of sand there in which he considers water and runs because of thirst he thinks maybe there will be water. So deer burial increases and the deer runs away after being thirsty. There is water on the horizon due to sight disorders. This disorder takes his life. The pleasures of life are also similar. Kabir Ji says in the form of a couplet-

“ तन धरि सुखिया कोई न देखा, जो देखा सो दुखिया।
वाटे वाट हर कोई दुखिया, क्या तपसी क्या वैरागी।
जोगी दुखिया, जंगम दुखिया, तपसी को दुख दूना।
आशा तृष्णा घट-घट व्यापक, कोई महल न सूना।“

“Kabir says that anyone who has have the body in this world is surrounded by sorrows. It is also unhappy that all the creatures living here, whether they are yogis or monks in humans. He told desire and greed the reason for all sorrows. “

It seems we are all a puppet in the hands of cruel power. There is no bait for the person to come out of it. If a person is thrown in deep mud and that person wants to leave from his power, he will not be able to get out. Similarly, no one is able to get out of this Bhavsagar (Land of death). The soul of the creature is trapped in this world and is bound by many obstacles. Kabir ji said that there is only one way out of this that is Satguru. He put his point in front of society as a couple-


  “बिन सतगुरु वाचे नहीं, कोई कोटिन्ह करे उपाय”

Kabir Ji says without Master Teacher (Satguru), no one can get rid of their sorrows.

परमात्मा की खोज में बाधक कौन

हम परमात्मा की खोज के लिए सगुण भक्ति या निर्गुण भक्ति के माध्यम से उपासना करते हैं। जो भी हो हमारी आत्मा उस परम तत्व की खोज चाहती है। हम उस परम तत्व की प्राप्ति कैसे करें?

कबीर जी ने उस परम तत्व के बारे में कहा कि वह किसी को पीड़ा देने वाला नहीं है। वह न कभी जन्मता है और न ही उसकी कभी मौत होती है। वह न स्त्री है न ही पुरुष है जबकि मन के चार रूप हैं।

जब मन निर्णय करता है तो उसे बुद्धि कहते हैं। जब यह याद करता है तो इसे चित्त कहते हैं। जब यह क्रिया करता है तो इसे अहंकार कहते है और जब यह संकल्प करता है तो इसे मन कहते हैं। इन भौतिक आंखों से हम जो भी देखते हैं वह हमारे चित्त में आ जाता है। हमने जीवन में जितनी क्रियायें की है जितने भी कर्म किये है, हमारे चित्त में संग्रहित हो गए हैं। कभी-कभी चित्त हमको वो बातें याद दिला देता है जिसको हम याद करना ही नहीं चाहते। ऐसी यादों के आने से हमको परेशानी होने लगती है। इसका मतलब है कि चित्त हमारे काबू में नहीं है।

इसी प्रकार बुद्धि का काम निर्णय लेने का है। परंतु कभी-कभी बुद्धि अनुचित फैसले भी कर लेती है जिसको करने के बाद हम पश्चाताप भी करते हैं। यदि आदमी किसी का कत्ल करने भी जा रहा जो तो यह भी उसका ही फैसला कहा जायेगा क्योंकि उसने कत्ल करने का निर्णय लिया है। कोई चोरी करने का, किसी को मारने का, गाली देने का इत्यादि जो भी वह निर्णय करता है यह सब विकारों की तरफ ही ले जाता है। यह शांति से अशांति की तरफ जाने का फैसला ही तो है। इसका मतलब यह हुआ कि बुद्धि के सभी फैसले सही नहीं होते हैं।

हम सब के जीवन में बहुत सारे ऐसे मौके आये होंगे जब हमने पश्चाताप किया होगा। इसका मतलब यह हुआ कि बुद्धि भी हमारे नियंत्रण में नहीं है। इसको गलत फैसले लेने पर कोई मजबूर कर रहा है।

इसी प्रकार मन संकल्प भी करता है। मन को शरीर की इच्छाओं के कारण संकल्प लेना पड़ता है। हम कई बार ऐसी इच्छायें कर लेते हैं और बाद में सोचते हैं कि यह इच्छा मैंने क्यों की? इसी प्रकार अहंकार है जो हमको मैं होने का अहसास कराता है और हम शारीरिक क्रियायें करते रहते हैं। मन ने जैसा भी संकल्प किया, चाहे वह उचित था या अनुचित, उसको अंजाम तक पहुंचाने में शरीर को क्रिया करनी ही पड़ती है। इसका मतलब हमारा शरीर में के संकल्प को मानने के लिये मजबूर है।

कबीर जी ने कहा कि ये ताक़तें बहुत शक्तिशाली हैं। चाहकर भी आदमी इनसे छूट नहीं पा रहा है। इनसे बच नहीं पा रहा है और ये ताक़तें हमको नचा रही हैं।

हम देखते हैं कि जब बन्दर मदारी के हाथ में आ जाता है तो सबसे पहले उसकी आज़ादी छिन जाती है। इसी प्रकार हमारी आत्मा भी इस मन के आवरण में जकड़ी हुई है। कभी-कभी देखने में हमको यह संसार बड़ा धोखा लगता है। आदमी अथक परिश्रम करके अपना घर बसाता है और अचानक एक दिन उसे सब कुछ छोड़कर जाना पड़ता है। क्या यह व्यवस्था ठीक है? सब मिलाकर देखने पर इस व्यवस्था में दोष नज़र आ रहे हैं। हम सबको इस दुनिया में स्थाई सुख, आनन्द व प्रसन्नता की खोज रहती है पर यह मिलते ही नहीं हैं। मृग मरीचिका की तरह हम भी प्रयास करते हैं।

रेगिस्तानों में मृग दूर क्षितिज पर पानी देखता है, जहाँ धरती और आकाश उसको मिलते हुए दिखते हैं। गर्मी के कारण उसको वहां रेत की चमक दिखाई देती है जिसे वह पानी समझता है और प्यास के कारण दौड़ता रहता है वह सोचता है शायद वहाँ पानी होगा। इस प्रकार मृग मरीचिका बढ़ती हो जाती है और मृग दौड़ते-दौड़ते प्यासा रहकर अपना दम तोड़ देता है। वहाँ क्षितिज में पानी उसको दृष्टि विकार के कारण दिखाई देता है। यह विकार उसकी जान ले लेता है। जीवन के सुख भी तो ऐसे ही हैं। कबीर जी एक दोहे के रूप में कहते है कि-

“  तन धरि सुखिया कोई न देखा, जो देखा सो दुखिया।
वाटे वाट हर कोई दुखिया, क्या तपसी क्या वैरागी।
जोगी दुखिया, जंगम दुखिया, तपसी को दुख दूना।

आशा तृष्णा घट-घट व्यापक, कोई महल न सूना।“


“कबीर कहते है कि इस संसार में जिसने भी शरीर को धारण किया हुआ देखा है वो दुखों से घिरा हुआ है। यहां पर रहने वाले सभी जीव चाहे वह मनुष्यों में जोगी या सन्यासी ही क्यों न हों, भी दुखी हैं। आशा और तृष्णा को उन्होंने सारे दुखों का कारण बताया।“

लगता है हम सब किसी क्रूर ताक़त के हाथों की कठपुतली हैं। इससे निकलने का इंसान के पास कोई चारा दिखाई नहीं देता है। यदि किसी गहरे कुंवे में किसी इंसान को फेंक दिया जाये और वह इंसान चाहे की वह अपनी शक्ति से कुंवे से बाहर निकल जाऊंगा, तो वह नहीं निकल पायेगा। इसी प्रकार इस भवसागर से कोई नहीं निकल पा रहा है। इस संसार में जीव की आत्मा फंसी हुई है और बहुत सारे बन्धनों से जकड़ी हुई है। कबीर जी ने कहा कि इससे निकलने का केवल एक ही तरीका है वह है सतगुरु । उन्होंने एक दोहे के रूप में अपनी बात समाज के सामने रखी-

 “ बिन सतगुरु वाचे नहीं, कोई कोटिन्ह करे उपाय”
..............ओम सत्य साहिब..................
 
 
 
 

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