Origin of Bijak

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King Nirmoh’s  father name was Vivek and mother’s name was Sumati. brother name was thought and the names of sons were Mercy, forgiveness, devotion, determination, patience, love, contentment, ease, joy, temperament, non-sense, fearless, Nirvikar. This was his family. They were all residents of Satpuri and were called sons of Satpurus (The Supreme God) in Satylok (The residence of Supreme God). Satpurush’s fifth son was also Kal Niranjan bu he was terminated by Satpurushon from Satylok.

When Niranjan be absorbed in disordered anger, greed, attachment and ego then the third body is produced. Eternal father Rajogun Brahma ji was revealed, the second eternal satoguni Vishnu ji and the third Tamoguni form Shiva ji. And then all together collected raw material of five elements, earth, water, air, fire, sky and five senses, five Carmen, indigenous hands, feet, mouth, vagina, anal gates, pancake eyes, nails, ears, tongue and skin, five life, five sub vitality, etc. for making this body and prepared a sample for eighty four lacs species . Desire as Maya, a myth holds the broad form of life. Made the limits of sin, virtue, shame, fear, wickedness and mercilessness.    Later God Jyoti Niranjan, together with Shakti Mahamaya named Jagdamba, became manifest in the form of  Savitri (wife of Lord Brahma),  Lakshmi (wife of Lord Vishnu), and Parvati (Wife of Lord Shiva) and became happy in  Paradise.

Lord Kal Niranjan himself has revealed in the form of Death, Yamraj (The Lord of Death), attachment, carving and Greed. As the resolve option of the mind ghosts grabbed the creature and forced them to walk according to their own accord.

Since time immemorial, this mind has been engaged with a ghost creature and running the organism according to its own accord. All the creatures are walking on the sayings of their mind, the voice of the soul has been unheard of and almost all creatures are distraught and paradox. Every creatures want to get all the peace that they can not find anywhere. If peace comes then it is not sustainable, it is for short time and temporary, it is not permanent.

The creature functions through the mind, intellect, mind and ego of purely inner senses. The big enlightened, the mind keeps Santo in the mind. Satguru Kabir came to this world and explained to various people in order to break the trap of this mind and to get rid of the creature from the mind. That is why he wrote the book titled “Bijak”.

Sant kabir das poems in hindi and english language are very famous in entire world.  He said that ‘O’ creatures you had to chant God with every breathing, but you forgot and did not even remember that when your breath would  be stopped. You have no control over this. This habit of breathing is running with the desire of Lord Niranjan. Therefore chant true lovely name of God with every breath. You are not born to enjoy materials , after all you have to go the house of Supreme God, where enjoyment of happiness never lost, otherwise your birth will go waste.

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हिंदी अनुवाद —-

राजा निर्मोह के पिता का नाम विवेक ओर माता का नाम सुमति था ।भाई का नाम विचार था ओर पुत्रों के नाम दया, क्षमा, शील, निहकाम, धैर्य, प्रेम, संतोष, सहज, आनन्द, स्वभाव,निरुपाधि, निर्भय, चेतन स्वरूप, निर्द्वन्द, निर्विकार था। ये उनका परिवार था। ये सभी सतपुरी के रहने वाले थे ओर सतलोक मे सतपुरुष के पुत्र कहलाते थे। सतपुरुष के ही पुत्र काल निरंजन भी हैं।

जब निरंजन काम, क्रोध, लोभ, मोह, अहंकार रूपी विषय विकारों में मग्न हो गये तब तीसरी काया उत्पन्न हुई। अनादि पितामह रजोगुण ब्रह्मा प्रगट हुए, दूसरे अनादि सतोगुणी विष्णु और तीसरे तमोगुणी रूप में सदा शिव प्रगट हुए। और फिर सबने मिलकर पांच तत्व पृथ्वी, जल, वायु, अग्नि, आकास व पंच ज्ञान, पंच कर्म इंद्री हाथ, पैर, मुँह, योनि, गुदा द्वार, पंच ज्ञानेंद्रि आंख, नाख, कान, जीभ ओर त्वचा, पंच प्राण, पंच उप प्राण आदि ये काया बनाने का कच्चा माल इकट्ठा कर चौरासी लाख योनियाँ का नमूना तैयार किया।

इच्छा रूप माया ब्रह्म व्यापक जीव रूप ने धारण क़िया। पाप , पुण्य , शर्म, भय, दुष्टता, निर्दयता की हद बनाई। बाद में ज्योति निरंजन ने शक्ति महामाया के साथ मिलकर अनादि सावित्री, अनादि लक्ष्मी, ओर अनादि पार्वती के रूप में प्रगट होकर भवसागर मे स्वर्ग, मृत्यु, पाताल बनाकर मगन हो गये।

काल रूप मे खुद ज्योति निरंजन यमराज, मोह, तृष्णा, लालच, भूत रूप में प्रगट हुए। मन के संकल्प विकल्प रूपी भूतों ने जीव को जकड़ लिया और अपने हिसाब से चलने को विवश कर दिया।  अनादि काल से ये मन रूपी भूत जीव के साथ लगा है और जीव को अपने हिसाब से चला रहा है। सब जीव अपने मन के कहे पर ही चल रहे हैं, आत्मा की आवाज़ को अनसुना कर दिया है और लगभग सभी जीव व्याकुल ओर परेसान है। सब शांति को पाना चाहते हैं जो उनको कहीं नहीं मिल रही है। शांति मिलती भी है तो वह टिकाऊ नहीं है, थोड़े वक़्त की ही है, स्थाई नहीं है। जीव शुद्ध रूप से अन्तःकरण की इंद्रियों मन, बुद्धि, चित्त, अहंकार के माध्यम से ही कार्य करता है। बड़े बड़े ज्ञानी, संतो को यह मन मोहजाल मे फंसाकर रखता है। इसी मन के फंदे को तोड़ने के लिए ओर मन रूपी भूत से जीव को छुटकारा दिलाने को सतगुरु कबीर इस संसार में आये और विभिन्न प्रकार से लोगों को समझाया। इस कारण उन्होंने बीजक नामक ग्रंथ की रचना की। बीजक में उन्होंने कहा कि हे जीव तुझे हर स्वास के साथ सतनाम का जाप करना था, पर तू भूल गया और ये भी याद न रहा कि न जाने तेरी स्वासें कब बन्द कर दी जाएंगी। इस स्वास पर तेरा नियंत्रण नहीँ है। यह स्वास पर ज्योति निरंजन की इच्छा से चल रही है इसलिए हर स्वास के साथ सतनाम का जाप कर ,तेरा असली घर ये संसार नहीं बल्कि सतपुरुष का निवास है,  अन्यथा तेरा जन्म बेकार चला जायेगा।

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