Pride

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It is the story on the truth of a learned man who becomes arrogant of his knowledge and forgets that pride is often considered a negative force in human existence as opposed to humility and a source of social friction.

Jayant Acharya was a great scholar of his time. Saraswati ( Goddess of knowledge, music, art, wisdom, and learning in vedic religion) resided in his throat so no one could defeat him in scripture.

जयंत आचार्यअपने समय के महान विद्वान थे। उनके कंठ में साक्षात सरस्वती का वास था। शास्त्रार्थ में उन्हें कोई पराजित नहीं कर सकता था।

Once he became proud of his scholarship by gaining immense fame, prestige and honor. He felt that he had acquired all the knowledge of the world and now there was nothing left to learn. There is no one more knowledgeable in the world than him.

अपार यश, प्रतिष्ठा और सम्मान पाकर एक बार जयंत आचार्य को अपनी विद्वत्ता का घमंड हो गया। उन्हें लगा कि उन्होंने विश्व का सारा ज्ञान प्राप्त कर लिया है और अब सीखने को कुछ बाकी नहीं बचा। उनसे बड़ा ज्ञानी संसार में कोई दूसरा नहीं।

Once, he went on his horse after receiving an invitation from the neighboring state for discussion. It was the summer season; the sun was shining very sharp and continuous travel made him thirsty. There was a path to the forest and no settlement was visible at all. After a little searching, he saw a broken hut. He moved towards that in the hope of water.

एक बार पड़ोसी राज्य से शास्त्रार्थ का निमंत्रण पाकर जयंत आचार्य अपने घोड़े पर रवाना हुए। गर्मी का मौसम था, धूप काफी तेज़ और लगातार यात्रा से जयंत आचार्य को प्यास लग आई। जंगल का रास्ता था और दूर तक कोई बस्ती दिखाई नहीं दे रही थी। थोड़ी तलाश करने पर उन्हें एक टूटी झोपड़ी दिखाई दी। पानी की आशा में वो उस ओर बढ चले।

hut in forest

There was also a well in front of the hut. He thought that if someone is in a hut, he should be requested to provide water.

झोपड़ी के सामने एक कुआं भी था। जयंत आचार्य ने सोचा कि कोई झोपड़ी में हो तो उससे पानी देने का अनुरोध किया जाए।

At the same time, a small girl came out of the hut with a pot. The girl filled the pot from well and started going.

उसी समय झोपड़ी से एक छोटी बच्ची मटका लेकर निकली। बच्ची ने कुएं से पानी भरा और जाने लगी।

Jayant Acharya went to him and said, “Baby! I am very thirsty, please drink some water. “The girl said, “Who are you?” I don’t even know you, introduce yourself first. ”

जयंत आचार्य उसके पास जाकर बोले” बालिके! बहुत प्यास लगी है ज़रा पानी पिला दे।” बच्ची ने कहा, “आप कौन हैं? मैं आपको जानती भी नहीं, पहले अपना परिचय दीजिए।”

He felt that who does not know me, what is the need to introduce me? Even though he was suffering from thirst, he said, “You are still small. So you do not know me. If someone is older at home, send him. He will recognize me. My name and honor is far and wide. I am a very learned person. “

जयंत आचार्य को लगा कि मुझे कौन नहीं जानता मुझे परिचय देने की क्या आवश्यकता? फिर भी प्यास से बेहाल थे तो बोले, “बालिके अभी तुम छोटी हो। इसलिए मुझे नहीं जानती। घर में कोई बड़ा हो तो उसको भेजो। वो मुझे देखते ही पहचान लेगा। मेरा बहुत नाम और सम्मान है दूर-दूर तक। मैं बहुत विद्वान व्यक्ति हूं।”

Unaffected by Acharya’s bravado and boastful words, the girl said, “You are saying untrue.” There are only two strong in the world and I know them both. If you want to quench your thirst, name them both”?

जयंत आचार्य के बड़बोलेपन और घमंड भरे वचनों से अप्रभावित बालिका बोली, “आप असत्य कह रहे हैं। संसार में सिर्फ दो ही बलवान हैं और उन दोनों को मैं जानती हूं। अपनी प्यास बुझाना चाहते हैं तो उन दोनों का नाम बतायें”?

Thinking for a while, Jayant Acharya said, “I don’t know, you tell me.” But give me water. My throat is drying up. “

थोड़ी देर सोचकर जयंत आचार्य बोले, “मुझे नहीं पता, तुम ही बता दो। मगर मुझे पानी पिला दो। मेरा गला सूख रहा है।”

Girl said, “Two strong are ‘grain’ and ‘water’. There is so much power in hunger and thirst to bow down even the strongest. See how your thirst made you.

बालिका बोली, “दो बलवान हैं ‘अन्न’ और ‘जल’। भूख और प्यास में इतनी शक्ति है कि बड़े से बड़े बलवान को भी झुका दें। देखिए तेज़ प्यास ने आपकी क्या हालत बना दी है।”

He was stunned. The argument of the girl was irrefutable. Jayant Acharya, who defeated the greatest scholars, stood silent in front of a girl.

जयंत आचार्य चकित रह गए। लड़की का तर्क अकाट्य था। बड़े से बड़े विद्वानों को पराजित कर चुके जयंत आचार्य एक बच्ची के सामने निरुत्तर खङे थे।

The girl asked again, “Tell the truth, who are you?” She was preparing to walk, He said a little humbly, “baby! I am a traveler. “

बालिका ने पुनः पूछा, “सत्य बताएं, कौन हैं आप?” वो चलने की तैयारी में थी, जयंत आचार्य थोड़ा नम्र होकर बोले, “बालिके! मैं बटोही हूं।”

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Smiling child girl said, “You are still lying. There are only two best travelers in the world. I know them both; tell me who those two are? “

मुस्कुराते हुए बच्ची बोली, “आप अभी भी झूठ बोल रहे हैं। संसार में दो ही बटोही हैं। उन दोनों को मैं जानती हूँ, बताइए वो दोनों कौन हैं?”

Strong thirst had already weakened Acharya’s intellect. But being helpless, he again expressed ignorance.

तेज़ प्यास ने पहले ही जयंत आचार्य की बुद्धि क्षीण कर दी थी। लेकिन लाचार होकर उन्होंने फिर अनभिज्ञता व्यक्त कर दी।

The child said, “You are calling yourself a great scholar and do not even know? From one place to another, it is called a non-fatiguing bath. There are two things, one moon and the other sun which keep moving without weary. You are tired. The hunger is getting exhausted by thirst. How can you be a passer? “

बच्ची बोली, “आप स्वयं को बड़ा विद्वान बता रहे हैं और ये भी नहीं जानते? एक स्थान से दूसरे स्थान तक बिना थके जाने वाला बटोही कहलाता है। बटोही दो ही हैं, एक चंद्रमा और दूसरा सूर्य जो बिना थके चलते रहते हैं। आप तो थक गए हैं। भूख प्यास से बेदम हो रहे हैं। आप कैसे बटोही हो सकते हैं?”

Saying so, the girl picked up a pot filled with water and went inside the hut. Now Jayant Acharya became unhappy.

इतना कहकर बालिका ने पानी से भरा मटका उठाया और झोपड़ी के भीतर चली गई। अब तो जयंत आचार्य और भी दुखी हो गए।

He has never been so humiliated in life. The power of the body was decreasing due to thirst. The mind was spinning. He looked towards the hut with hope. Then an old woman came out from inside. He had an empty pot in his hand. She started filling water from the well.

वे जीवन में इतने अपमानित कभी नहीं हुए। प्यास से शरीर की शक्ति घट रही थी। दिमाग़ चकरा रहा था। उन्होंने आशा से झोपड़ी की तरफ़ देखा। तभी अंदर से एक वृद्ध स्त्री निकली। उसके हाथ में खाली मटका था। वो कुएं से पानी भरने लगी।

Jayant Acharya, who has been quite humble till now, said, “Mother! I have a bad condition from thirst. Give water all over the stomach, will be a great virtue. “

अब तक काफी विनम्र हो चुके जयंत आचार्य बोले, “माते! प्यास से मेरा बुरा हाल है। भर पेट पानी पिला दीजिए बड़ा पुण्य होगा।”

The old mother said, “Son, I don’t know you. Introduce yourself. I will definitely feed you water.

बूढी माँ बोलीं, ” बेटा मैं तुम्हें जानती नहीं। अपना परिचय दो। मैं अवश्य पानी पिला दूँगी।”

“ Acharya said, “I am a guest, please give me water.” “How can you be a guest? There are only two guests in the world. First money and second youth. It doesn’t take time to go, tell the truth, who are you? ”

जयंत आचार्य ने कहा, “मैं मेहमान हूँ, कृपया पानी पिला दें।” “तुम मेहमान कैसे हो सकते हो? ।”
संसार में दो ही मेहमान हैं। पहला धन और दूसरा यौवन। इन्हें जाने में समय नहीं लगता,सत्य बताओ कौन हो तुम?”

Desperate Acharya, defeated by all the arguments so far, said, “I am tolerant.” Give water to drink. “

अब तक के सारे तर्क से पराजित हताश जयंत आचार्य बोले “मैं सहनशील हूं। पानी पिला दें।”

“No, there are only two tolerant. First, the earth, which bears the burden of all sinful and virtuous souls, rips its chest and sows its seeds and also stores the grains. Secondly, trees that are stoned still give sweet fruits. You are not tolerant. Who are you? “

“नहीं, सहनशील तो दो ही हैं। पहली, धरती जो पापी-पुण्यात्मा सबका बोझ सहती है, उसकी छाती चीरकर बीज बो देने से भी अनाज के भंडार देती है। दूसरे, पेड़ जिनको पत्थर मारो फिर भी मीठे फल देते हैं। तुम सहनशील नहीं। सच बताओ कौन हो?”

Jayant Acharya fell into a state of confusion and shrugged from arguments, “I am obstinate.”

जयंत आचार्य लगभग मूर्छा की स्थिति में आ गए और तर्क-वितर्क से झल्लाकर बोले,” मैं हठी हूं।”

“Again Lying?”

“फिर असत्य?

There are only two stubborn, first nail and second hair. How many bites come out again and again? Say the truth, who are you Brahmins? “

हठी तो दो ही हैं, पहला नाखून और दूसरा बाल। कितना भी काटो बार-बार निकल आते हैं। सत्य कहें ब्राह्मण कौन हैं आप?”

Completely humiliated and defeated Acharya said, “Then I am a fool.”

पूरी तरह अपमानित और पराजित हो चुके जयंत आचार्य ने कहा, “फिर तो मैं मूर्ख ही हूं।”

“No, how can you be stupid? There are only two fools. The first king who rules all even without merit, and the second court priest who tries to prove the king right by pleading the wrong thing to please the king. “

“नहीं तुम मूर्ख कैसे हो सकते हो। मूर्ख दो ही हैं। पहला राजा जो बिना योग्यता के भी सब पर शासन करता है, और दूसरा दरबारी पंडित जो राजा को प्रसन्न करने के लिए ग़लत बात पर भी तर्क करके उसको सही सिद्ध करने की चेष्टा करता है।”

In the event of some inability to speak, Jayant Acharya fell at the feet of the old lady and started pleading for water.

कुछ बोल न सकने की स्थिति में जयंत आचार्य वृद्धा के पैर पर गिर पड़े और पानी की याचना में गिड़गिड़ाने लगे।

Wake up son… When Acharya looked up after hearing this voice, Mata Saraswati was standing there. He bowed down again.

उठो वत्स… ये आवाज़ सुनकर जब जयंत आचार्य ने ऊपर देखा तो साक्षात माता सरस्वती वहां खड़ी थी। जयंत आचार्य पुनः नतमस्तक हो गए।

“Knowledge comes from Education not ego. You accepted the honor and prestige received on the strength of education as your achievement and sat down in arrogance. So I had to pretend to open your eye. “

“शिक्षा से ज्ञान आता है न कि अहंकार। तूने शिक्षा के बल पर प्राप्त मान और प्रतिष्ठा को ही अपनी उपलब्धि मान लिया और अहंकार कर बैठे। इसलिए मुझे तुम्हारे चक्षु खोलने के लिए ये स्वांग करना पड़ा।”

Jayant Acharya realized his mistake and proceeded after drinking a lot of water.

जयंत आचार्य को अपनी गलती समझ में आ गई और भरपेट पानी पीकर वे आगे चल पड़े।

Sant Kabir said:

“JUB MAI THA TAB HARI NAHI, AB HARI HAI MAI NAHI

PREM GALI ATI SANKRI, YA MAI DOU N SAMAY”

जब मैं था तब हरि नहीं अब हरि है मैं नाहीं ।
प्रेम गली अति सांकरी
यामें दो न समाहीं ॥

sense: As long as there was ego in mind, God was not interviewed, when the ego (ego) ended, then only God would meet. When God is interviewed, then the ego is automatically destroyed.

भावार्थ : जब तक मन में अहंकार था तब तक ईश्वर का साक्षात्कार न हुआ, जब अहंकार (अहम) समाप्त हुआ तभी प्रभु मिले , जब ईश्वर का साक्षात्कार हुआ तब अहंकार स्वत: ही नष्ट हो गया।


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