Shekh Farida’s Sacrifice and penance

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This is a real story of Sekh Farida’s sacrifice and penance. There was a boy named Sheikh Farida. When he was twelve years old, he asked his mother that here in the world, few people are man, few women and few animal too. Why are not all same? Why is it like this?

Mother said, “Son, this world is a destructible and temporary. After many births, human birth happens after doing many good works. Farida asked her mother, what should a person do then? Mother replied that human beings should chant the true name of the God (Satyanam) and worship to Supreme God (Satpurush) truthfully which animals do not.

Mother said that as I have heard, few people who are God’s true devotees also go to the forest to sing praises. Listning that he also decided to move forest someday.

One day Farida went to the forest to sing hymns. Mother found a lot but she could not search him. Mother started thinking that he  may go to the forest? She called him in the nearby forests, but she could not find him.

Shekh Farida reached deep inside the forest. He had eaten flowers and leaves there to alive and practiced penance for twelve years and then came back to the home. Mother put him on her neck. Mother bathed him and fed him fresh food.

Mother asked, where did you go? He said to worship in the jungle. There, I satiate my hunger by eating flowers and leaves, and did my penance. Mother said that, I was very worried, you didn’t tell me before. Saikh Farida said okay, now I will ask you first.

One day Shekh Farida told her mother that he want to do penance again. He said, Can i go to the jungle?  Mother said alright but be safe and comeback soon.,  Shekh went to the forest to perform penance and again for twelve years. He used to recite in the jungle. When hunger persecuted him, he tied a round piece of wood on his stomach and bound it for many years.

After twelve years, he returned home. When the mother saw a piece of wood tied to his stomach, she asked, why have you tied this wood piece to the stomach? Shekh said, “For the first time in my life, hunger has spared me, so to avoid hunger I tied this in my stomach and alive with drinking water.

Mother said if you practiced austerities on a shelter, then the penance would also be successful and you do not even get hungry. Shekh said, now I have grown up.  I will go to the forest and will come soon after fulfilling my penance. Mother said, okay. Shekh Farida then moved towards the forest.

On the way he showed a well. There were many bushes inside the well. Farida stuck his legs in the bushes and turned upside down in the well and started to meditate. He prays that his life will go away, but he was firm determined to complete his penance. He took full breath with the name of God and began to pray.

Sant Kabir  says when a man takes some effort by hard work and if someone stops him to do same, he should not comes in anger and curses someone, then his ascetic is destroyed. He said that when someone hurts you, you  should not be angry, God  does justice to one who takes away the other’s sorrows.

After twelve years he returned home again. Mother asked if this hunger did not hurt you this time? So he said this time, I got frustrated and filled the air in the stomach and done penance. Mother said, the true meditation is done like this process. Due to the illness of mother, he remained in the house and served her mother for a while for some time.

After some time the mother died. He become very sad. Being alone, he left his home and went again to the forest. He saw a lot of people worshiping in one place in the jungle. Some Banjara ( Banjara are a class of usually ascribed as nomadic,gypsy people from the different Indian states). They were coming to give almonds, coconut, betel nuts, mills to their bulls and oxen.

Saikh Farida asked him, what are the loads in these oxen and where are you taking them for? They said we are carrying stones to handover. When the Bazarzara lowered the loaded goods to the people, they started crying. They asked why are you crying? Banjara said they had lied to someone that stones are looded over bulls and oxens.  And these goods have changed into stones. They said no worry, bring it again. Banjare returned with his oxens to bring dry fruits and then came towards the forest.

They got back and recognized him. Once again Farida asked, what are you bringing in oxen? Banjare said diamonds, gems, gold are bringing. He said to show goods? The whole thing was changed to the jewelery.

Now all the Banjara people became a devotee of Farida. He made a Dargah (the tomb or shrine of a Muslim saint) and a luxurious temple of millions of rupees from those gems and went  by saluting Farida.

After some time, Sant Kabir met Farida and taught the lesson of salvation and freed him from the bonds of death and took  him Satylok (the residence of Supreme God). If someone does any work with tenacity and force, then his sacrifice become successful.

Truth beyond legend.


हिंदी अनुवाद—

एक शेख फरीदा नाम का लड़का था। जब वह बारह वर्ष का हुआ तो अपनी माँ से पूछा इस संसार में कोई मनुष्य है, कोई जानवर। सब एक जैसे क्यों नहीं हैं ?  ऐसा क्यों है?  माँ ने कहा सुन बेटा ये संसार नाशवान है।कई जन्मों के बाद मनुष्य का जन्म बड़ी मुश्किल से  मिलता है। फरीदा ने अपनी माँ से   पूछा कि तो फिर मनुष्य को क्या करना चाहिए ? माँ ने उत्तर दिया कि मनुष्य को सत्यपुरुष का भजन और सत्यनाम का जाप करना चाहिये। जैसा जानवर नहीं करते हैं। माँ ने कहा जो भगवान के सच्चे भक्त होते है वो तो भजन करने जंगल भी चले जाते हैं। एक दिन फरीदा भजन करने के लिये जंगल को चले गया। माँ ने बहुत ढूँढा पर वो नहीं मिला। माँ सोचने लगी कहीं वो भी तो जंगल को नहीं चले गया ? वह आस पास के जंगलों में उसको पुकारते हुए गयी, पर वह नहीं मिला। फरीदा दूर जंगल को निकल चुका था। उसने वहाँ फूल पत्ते खाकर बारह वर्षों तक तपस्या की और फिर घर को आ गया। माँ ने उसको अपने गले से लगा लिया।  माँ ने उसको नहलाया और उसको खाना खिलाया। माँ ने पूछा, कहाँ चले गया था? वह बोला जंगल में भजन करने गया था। वहाँ मैंने फूल और पत्तियां खाकर अपनी भूख मिटाई और खूब तपस्या की। माँ ने कहा बता कर जाना चाहिए, मुझे बहुत चिंता हो गयी थी। फरीदा बोला ठीक है अब जाऊंगा तो पूछ कर जाऊँगा।

एक दिन फरीदा ने अपनी माँ से कहा कि मैं फिर से तपस्या करना चाहता हूँ। क्या मैं जंगल जाऊं ? माँ ने कहा ठीक है, तू जा पर जल्दी आ जाना। फरीदा तपस्या करने जंगल को चले गया ओर बारह वर्षों तक उसने जंगल में भजन ओर तप किया। जब भूख ने उसको सताया तो उसने लकड़ी का एक गोल टुकड़ा अपने पेट से बांध लिया और बढ़ वर्षों तक उसको बांधे रहा। बारह वर्ष बीतने के बाद वह वापस घर को लौटा। माँ ने लकड़ी का टुकड़ा उसके पेट से बंधा देखा तो पूछा कि इसको तूने पेट से क्यों बांध रखा है ? फरीदा ने कहा माँ जंगल में पहली बार जाने पर भूख ने मुझे बहुत बार परेसान किया था इसलिए भूख से बचने के लिये मैंने इसको पेट से बांध लिया और पानी पीकर ही काम चलाया। माँ ने कहा यदि तुम किसी आसरे के सहारे तपस्या करते तो तपस्या भी सफल हो जाती और तुमको भूख भी नहीं सताती। फरीदा ने कहा, अब मैं बड़ा हो गया हूँ। मैं फिर जंगल को जाता हूँ और अपनी तपस्या पूरी करके जल्दी आ जाऊंगा। माँ बोली, ठीक है। फरीदा फिर जंगल की ओर चल दिया। रास्ते में उसको एक कुवाँ दिखा । कुऐं के अंदर बहुत सारी झाड़ियां लगी थी। फरीदा ने अपने पैरों को झाड़ियों में फँसा लिया और उल्टा होकर कुंवे में लटक गया ओर तप करने लगा। उसने प्रण किया कि चाहे उसकी जान चली जाए पर वह तपस्या पूरी करके रहेगा। वह परमात्मा का नाम लेकर पूरी सांस खींचता और भजन करने लगा।  कबीर साहिब कहते हैं जब मनुष्य मेहनत करके कुछ पा लेता है और जब उसको उसको कोई रोकता है और वो गुस्से में आकर  किसी को श्राप देता है तो उसका तप नष्ट हो जाता है।कबीर साहिब ने कहा कि जब आपको कोई दुख दे, सताये तो उसको श्राप नहीं देना चाहिये। इसका न्याय परमात्मा करता है जो दूसरे के दुखों को अपने सर ले लेता है।।

बारह वर्षों के बाद फरीदा फिर घर आया। माता ने पूछा क्या इस बार तुझको भूख ने नहीं सताया?  तो वह बोला इस बार मैंने निरास होकर सिर्फ पेट में हवा भरकर तप किया। माँ ने कहा, तप इसी तरह किया जाता है। माँ के बीमार रहने के कारण वह कुछ समय तक वह घर में ही रहा और अपनी माँ की सेवा की। कुछ समय बाद माँ का देहांत हो गया और वह फिर जंगल को चले गया। उसने देखा जंगल में बहुत सारे लोग  एक जगह पर भजन कर रहे थे। कुछ बंजारे लोग अपने बैलों के ऊपर बादाम, नारियल, सुपारी, छुहारे लेकर उनको देने आ रहे थे। फरीदा ने उनसे पूछा इन बैलों में क्या लदा है और कहाँ किसके लिए ले जा रहे हो ? वे बोले बैलों में पत्थर लदे हैं। बंजारों ने बैलों पर लदे सामान को भजन कर रहे लोगों के पास उतारा तो वह रोने लगा। उन्होंने पूछा तुम रो क्यों रहे हो ? बनजारा ने कहा उसने किसी से झूठ बोला था कि बैलों में पत्थर लदे हैं। और ये सामान पत्थरों में बदल गया है। भजन करने वाले बोले कोई बात नहीं, फिर से ले आओ। बनजारे अपने बैलों को लेकर वापस गये और ड्राई फ़ूड लादकर फिर जंगल की ओर आ गये। फरीदा उनको फिर मिल गया। उन्होंने भी उसको पहचान लिया। एक बार फिर से फरीदा ने पूछ लिया कि बैलों में लादकर क्या ला रहे हो ?  बनजारे ने कहा हीरे, जवाहरात, सोना है जी। उसने कहा अच्छा दिखाओ ? देखा तो सारा सामान जवााहरात में बदल गया था। अब बनजारे फरीदा के भक्त बन गये। उन्होंने उन जवाहरातों से लाखों रुपयों का दरगाह ओर आलीशान मंदिर बना दिया और फरीदा को प्रणाम कर चल दिये। फरीदा को कुछ समय बाद कबीर साहिब ने दर्शन दिये और उपदेश सुनाये और उनको जन्म मृत्यु के बंधनों से मुक्त कर सत्यलोक ले गये।  यदि कोई तप और बल से किसी कार्य को करता है तो उसका पुरुषार्थ सफल होता है।

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