Sant Kabir Das Biography

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पाठकों की सुविधा के लिये ब्लॉग को पहले अंग्रेज़ी व अंत में हिंदी अनुवाद के साथ प्रस्तुत किया है

(In order to facilitate the readers, the blog is presented with first English and finally Hindi translation)



Sant Kabir Das ji was born in 1398 AD in Uttar Pradesh state of India, in the Lahartara pond in Varanasi city on a lotus flower. He did not come from any man’s womb.  But cannot say anything about the mother and father of Kabir das and about the information about the birth, but it is believed that Kabir’s upbringing was followed by a married couple named Niru and Nima.

Kabira remained unmarried all his life. He used to say that I have not got this life to work, anger, greed, attachment and ego but have got to meet God to win. He never used to live in one place and then roam the country. Those who were afflicted with misery and misery, used to distribute their sorrows by sharing their knowledge and experiences. They brought a unclaimed girl to his mother for the purpose of removing the misery of the daughter named Loi. He had brought such a unclaimed flowing boy in the river and a same girl Kamali home too. The hypocrites of the society were very upset with their truthful words and bold thoughts and teachings. Because of them, the business of their lies fell into disrepute. There was a crisis of food in front of them. For this reason, he left no stone unturned in defaming Kabira. Some people started saying that they married a girl named Loi. Kamal and Kadali are their sons and daughters. Kabira is a liar etc. It is said that truth can be upset but it never overthrown. Kabir’s fame went on growing night and day.

Kabira ji had not been educated so his knowledge was neither book or classical. He used to say that without reading the books, even after reading the two and a half letters of love, there can also be a good genius or scholar. They created the love, kindness, goodwill, purity, nonviolence and bold truth to base of his life. Kabira started handing over his ancestral business (Textile Fabrication). Kabir das had made Ramanand a master by taking Ram’s name education. He used to know the practice and wisdom that he had learned in his life, he used to tell the wise one thing


“You believe in what is written in papers and I believe in the truth from the eyes”.


  • Due to travel to many places, they started speaking a variety of languages. They used to go along with Sage and Saint to roam. Kabir’s language is also called ‘Sadhukadi’.
  • Kabir’s speech is written in Sakhi, Sabad and Ramani in all three forms.
  • In Kabir’s view, the position of the master was more than that of God.
  • Kabir was a fearless saint who spoke boldly and truthful.


In India’s society, there was a lot of caste, hatred and superstition at that time. That is why in the people there was such a perception that if someone dies in Maghar (A place near Gorakhpur in Uttar Pradesh state in India), then he goes to hell and who dies in Kashi, he goes to heaven. Upon hearing this, Kabira Dev went away from Kashi with a view to ending this belief and to end his fears with the hearts of people, and managed to give clear message to the society. In 1518 AD he left his body. The people of all caste communities were their devotees. They considered Kabira as his ideal. After the body was abandoned, there was a dispute about their bodies in Hindu and Muslim communities.

Hindus wanted to burn the body according to their cultural believe and Muslims wanted to bury the dead body. After his death, he also gave a message to join the society. When the sheet is removed from their dead bodies, they get different types of flowers in place of the body. Everyone was amazed at this view. Both Hindu Muslims divided the flowers among themselves and sacrificed their lives according to their faith and belief.

Today, about six hundred years ago, when the total population of the world would have been in crores, the number of followers of Saint Kabir Das was approximately eighteen lacs. Life like Kabira is not easy in today’s time. If there were Kabira today, thousands of lawsuits were going on in courts today.

The God of Kabir Das



जीवन परिचय-

कबीर का जन्म सन 1398 ई. में  भारत स्थित उत्तर प्रदेश राज्य के बनारस शहर मे लहरतारा तालाब मे एक कमल के फूल के ऊपर हुआ ।वह किसी मनुष्य के गर्भ से नही आये। कबीरदास के माता और  पिता और जन्म के बारे   जानकारी के बारे में  कुछ नहीं कह सकते लेकिन  फिर भी यह  माना जाता है कि कबीर का ललन पालन  नीरू औरनीमा नामक जुलाहे दम्पत्ति ने किया था उनके सत्य वचनों और निर्भीक विचारों और उपदेशों से समाज के पाखंडी लोग बहुत परेशान थे। उनके कारण उनका झूठ का व्यापार मंदा पड़ गया था। उनको सामने रोज़ी रोटी चलाने का संकट आ गया था। इस कारण उन्होंने कबीर को बदनाम करने में कोई कसर नहीं छोड़ी। कुछ लोग कहने लगे कि कबीर में लोई नाम की लड़की से शादी कर ली। कमाल और कमाली उनके पुत्र और पुत्री हैं। कबीर झूठा है इत्यादि। कहते हैं सत्य परेसान तो हो सकता है पर परास्त कभी नहीं होता। कबीर की ख्याति दिन रात बढ़ती चली गयी।

कबीर जीवनभर अविवाहित ही रहे। वो कहते थे कि मुझे ये जीवन काम, क्रोध, लोभ, मोह ओर अहंकार की पूर्ति के लिए नहीं मिला है बल्कि जीते जी परमेश्वर को पाने के लिए मिला है। वह कभी इस देश तो कभी उस देश में घूमते रहते थे। जो भी दीन और दुखी मिलते उनके दुखों को अपना ज्ञान और अनुभव बांटकर दूर करते थे। लोई नाम की कन्या के दुख दूर करने के उद्देश्य से वे उसे अपनी माता के पास ले आये थे। ऐसे ही कमाल ओर कमाली को भी घर ले आये थे।

कबीर पढ़े लिखे नहीं थे इसलिए उनका ज्ञान पुस्तकीय या शास्त्रीय नहीं था। वह कहते थे पुस्तकों को पढ़े बगैर भी केवल प्रेम के ढाई अक्षर पढ़कर भी कोई ज्ञानी या पंडित हो सकता है। उन्होंने प्रेम, दया, सदभावना, पवित्रता, परोपकार और निर्भीक सत्य को जीवन का आधार बनाया। कबीर ने अपने पैतृक व्यवसाय (कपड़ाबुननेकाकाम) में हाथ बँटाना शुरू किया। कबीरदासने नामदान लेकर रामानंद को गुरु बनाया था। अपने जीवन में उन्होंने जो साधना और शालीनता से पाया, वही उनका ज्ञान था वे ज्ञानी विद्वान को एक बात कहा  करते थे

‘तू कहता कागद की लेखी, मैं कहता आँखों की देखी’


अनेक जगहों की यात्रा करने के कारण वे अनेक प्रकार की भाषा बोलने लगे थे। वे साधू संतो के साथ इध रउधर घूमने जाते रहते थे । कबीर की भाषा को ‘सधुक्कड़ी’ भी कहा जाता है |

  • कबीर की वाणी को साखी, सबद और रमैनी तीनो रूपों में लिखा गया है
  • कबीर की दृष्टि में गुरु का स्थान परमेश्वर से भी बढ़कर था।
  • कबीर निर्भीक सत्य बोलने वाले निडर संत थे।

कबीरदास का निधन

भारत के समाज में उस समय जात पाति, छुवा छुत और अंधविस्वास बहुत ज्यादा था ।जिस कारण लोगो में ऐसी धारणा फैल गयी  थी कि अगर कोई  मगहर में मरता हे  तो वह  नरक में जाता है और जो काशी में मरता हे वह स्वर्ग में जाता है।
यही बात सुनकर कबीर इस धारणा को समाप्त करने और लोगों के दिलों से भय समाप्त करने के उद्देश्य से अपनी मृत्यु निकट जानकर काशी से मगहर चले गये और समाज को साफ सुधरा संदेश देने में कामयाब रहे। सन 1518 ई. में उन्होंने अपना शरीर छोड़ दिया। सभी जाति समुदाय के व्यक्ति उनके भक्त थे। वे कबीर को अपना आदर्श मानते थे। शरीर के त्यागने के बाद भी हिन्दू और मूसलमानों में उनके शव को लेकर विवाद हुआ था। हिन्दू अपनी प्रथा के अनुसार शव को जलाना चाहते थे और मुस्लिम शव को दफनाना चाहते थे। अपनी मृत्यु के बाद भी वह समाज में मिल जुल कर रहने का संदेश दे गये। उनके शव से जब चादर हटाकर देखा गया तो शव के स्थान पर तरह तरह के फूल मिले। इस नज़ारे को देखकर सभी लोग चकित थे। हिन्दू मुसलमान दोनों ने फूलों को आपस में बाँट लिया और अपने विश्वास और आस्था के अनुसार उनका संस्कार किया।

आज से लगभग छ सौ साल पहले जब दुनिया की कुल आबादी करोड़ों में रही होगी, संत कबीरदास के अनुयायियों की संख्या लगभग अठारह लाख थी। कबीर जैसा जीवन जीना आज के समय में आसान नहीं है। आज कबीर होते तो उनके ऊपर कोर्ट और कचहरियों में हज़ारों मुकदमे चल रहे होते।



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