Satguru and True way

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If you look at the present devotees and try to choose any devotion for your welfare, there are huge difficulties in finding Satguru and true way. Here there is a need for such a Satguru who can make the knowledge of truth, that is, the elements speak of knowledge and move towards an ultimate element, not just the stories etc. But most people are getting diabolical powers that tell the path of devotion. They talk about three loka more, but they reduce the talk of the fourth loka. From their activities, it is known that what devotional paths these people will tell.

Kabir Sahib put his point in the form of a couplet in front of the society for the devotees and devotees of the devil who devased the creatures.

Kabir ji is saying that there are people who are devoted in this world, such as Deities, their gana, Muni etc. people are all following the same things of the Munn (The generator of thought). They do not have control over their Munn, but the Munn is riding on them. Whatever the Munn is doing to them and it is compelled to accept the ideas and instructions sent by them. The Munn has kept them such a position like  a mill grinds the grain. But still these people are not able to know. The reasons for which they are failing to know the distinction of the Munn. Kabir says that only after knowing him, it is possible to achieve the Param Purush (The almighty God), but the seeker must be the shadow of a Satguru on the same and simultaneously the seeker should be determind on walking on the knowledge path of the Satgur

Satguru-

Kabir ji said that there are seven kinds of gurus in this world. Of which the master of seventh rank is called Satguru. Every Satguru does his work with great caution and complete dedication like his child.

Putting light on the Satguru, he says that the first guru is those who create and raise the organism. The second guru helps him in the time of the creation of the organism for painless birth of the organism.

The third guru is called a person who keeps a nice and sweet name after the birth of the creature. He wants a person named to be famous. The fourth guru is one who provides a good education to the creature and wants that my disciple becomes an influential person in the society.

The fifth master is the person who carries the wedding ceremony of the creature and wants his life to be happy. The sixth guru gives education of the religion. He tells that going on this path of religion will be your welfare.

The seventh Guru gives the essence of the education of all religions to the organism and tells the way to attain a supreme man. On which one is able to make his life successful by attaining Paramatma and releases himself from the bonds of birth and death forever.

सतगुरु और सत्य मार्ग

यदि वर्तमान में चल रही भक्तियों पर नज़र डालें और अपने कल्याण के लिये किसी एक भक्ति को चुनने का प्रयास करें तो सतगुरु और सत्य मार्ग को खोजने में भारी कठिनाइयाँ आ रही हैं। यहाँ पर ऐसे सतगुरु की आवश्यकता है जो सत्य का ज्ञान कराये यानि तत्व ज्ञान की बातें करे और एक परम तत्व की ओर ले चले, न कि केवल कथा इत्यादि सुनाये। परन्तु ज्यादातर लोग शैतानी ताक़त तक कि भक्ति का मार्ग बताने वाले मिल रहे हैं। वे तीन लोक की बातें ज्यादा करते हैं परन्तु चौथे लोक की बात कम करते हैं। इनके क्रियाकलापों से ज्ञात होता है कि ये लोग कौन सा भक्ति मार्ग बतायेंगे।

 

कबीर साहिब ने जीवों को सताने वाले शैतान की भक्ति करने और कराने वालों के लिये समाज के सामने एक दोहे के रूप में अपनी बात रखी।

 
“गण गन्धर्व मुनि और देवा सबहि करें मन की सेवा।
पीर पैगम्बर कुतुब ओलिया, मन ही निरंजन सब को दलिया।
सिद्ध, साधक और जोगी जत्ती, मन को जान न पाये रत्ती।
जाये निरंजन माही समाई, आगे का कोई भेद न पायी।
इसके आगे भेद परमपुरुष का, जानेगा कोई जाननहारा।
कहे कबीर जानेगा वही, जिसपर कृपा सतगुरु की होई।“
 

कबीर जी कह रहे हैं कि इस संसार में जितने भी भक्ति करने वाले लोग हैं जैसे देवता, उनके गण, मुनि इत्यादि लोग, ये सभी मन की ही बातों पर चल रहे हैं। इनका मन के ऊपर नियंत्रण नहीं है बल्कि मन इनके ऊपर सवार है। मन जैसा चाहे इनसे करा रहा है और ये उसके द्वारा भेजे गये विचारों और निर्देशों को मानने पर मजबूर हैं। मन ने इनको ऐसे दल दिया है जैसे कोई चक्की अनाज को पीस देती है। लेकिन फिर भी ये लोग मन को नहीं जान पा रहे हैं। जिस कारण मन से आगे का भेद जानने में असफल हो रहे हैं। कबीर कहते है कि मन को जानने के बाद ही परमपुरुष को जान पाना सम्भव है परन्तु साधक पर किसी सतगुरु की छाया होनी आवश्यक है साथ ही साधक सतगुरु के बताये ज्ञान मार्ग पर चलने वाला होना हो।

 
सतगुरु –

कबीर जी ने कहा कि इस संसार में सात प्रकार के गुरु होते हैं। जिनमें से सातवें नम्बर के गुरु को ही सतगुरु कहा जाता है। प्रत्येक सतगुरु अपने कार्य को अपने बच्चे की तरह बड़ी सावधानी और पूर्ण समर्पण के साथ करता है।

 

सतगुरुओं के ऊपर प्रकाश डालते हुए वे कहते हैं कि प्रथम गुरु वे होते हैं जो जीव को पैदा करते है और उसकी परवरिश करते हैं। दूसरा गुरु उसे कहते है जो जीव के उत्पन्न होते समय उसकी मदद करता है ताकि जीव को पैदा होने पर कम से कम कष्ट हो।

 

तीसरा गुरु वह कहलाता है जो जीव के पैदा होने के बाद उसका एक अच्छा सा और प्यारा नाम रखता है। वह चाहता है कि मेरे द्वारा रखे गए नाम का व्यक्ति प्रसिद्ध हो । चौथा गुरु वह होता है जो जीव को एक अच्छी शिक्षा प्रदान करता है और चाहता है कि मेरा शिष्य समाज में कोई प्रभावशाली व्यक्ति बने। पाँचवाँ गुरु वह होता है जो जीव का विवाह संस्कार कराता है और चाहता है कि उसका जीवन सुखी रहे। छटा गुरु जीव को धर्म की शिक्षा देता है। वह बताता है कि इस धर्म मार्ग में चलकर तुम्हारा कल्याण होगा।

 

सातवाँ गुरु जीव को सभी धर्मों की शिक्षा का सार बताता है और एक परमपुरुष को पाने का मार्ग बताता है। जिस पर चलकर जीव परमतत्व को प्राप्त करके अपना जीवन सफल बना लेता है तथा हमेशा के लिये जन्म और मृत्यु के बंधनों से अपने को मुक्त कर लेता है।

.............ओम सत्य साहिब..................

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