Satguru’s Majesty

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All presently available instruments are not capable of delivering salvation to the soul. Selfishness is hidden behind the prevalence of these means. These tools have been made by seekers for their self-sufficiency. Therefore, the society which adopted these means has become confused. Whether unwanted person remains confused at the same place. It means that we will require any Satguru’s majesty to end this confusion

Quality is essential within the SatGuru. Must be a guru who is not selfish, greedy He does not do this work to fill the stomach. He is not spending ordinary life like ordinary people. He should not be the one to run behind the wealth. There should not be familyism in it. If the above symptoms are not seen in it, then the true elementry knowledge cannot provide you.

Choosing a guru is very important. The guru does not tell the path of attaining the divine and the meditation method but also tells the device to conquer this world. In theology, the great glory of the guru has been told, but Kabir ji has given the Guru a higher status than God. They say that even if all the trees in the world are made penand the sea is made into ink, even then the glory of the master cannot be written.

According to Kabir, Satguru possesses such a virtue that he crosses us through the world. Just as a moth worm, after listening to its sound, creates the larvae of the other creature in its own way, as iron comes in contact with the stone, and iron turns into gold, as if the swan separates milk and water, exactly the same way. After getting Satguru’s asylum, man becomes free from all the bonds of the death. The benefactor of salvation is called Satguru only.

Satguru has a special device called “Namdan”. Satguru’s lightned devotee’s heart through this method. It is such that as a room requires light to end the darkness, so there is a need of Satguru to publish the heart because the outer sun and moon light can not light the darkness of the heart.

The guru has a great power of meditation and consciousness. When Satguru is holding this property, he gives education. The heart of man begins to be pure and light begins to grow in the heart. In the light of the heart disorders such as Maya, Mamta, work, anger, greed, and attachment begin to appear. The disorders were not understood by the mind first. Man gets cautious.

When a man walks, because of his carelessness, the stone is bruised in his feet, because he does not appear, he falls, but when the accident is already predicted, the person becomes careful before the accident, then it is easy to walk it happens. The heart of the master is published itself, due to which it is able to make the heart of another also bright. Therefore Satguru is praised.

All the activities of the world are being done through meditation. The atom bomber has also made it in such a way that it does not rot in its own way. In the same way Satguru also publishes the heart through his meditation so that he is not easily blinded. Just as no scientist has been able to make pearls till date, but a small oyster makes it easy because it has the capacity inside it. Satguru also does the same work.

Any blind person goes with caution; it seems to stumble one day or the other, so howsoever big a scholar can be, he can not lighten his own heart. As long as there is no spiritual power inside him, this work is impossible for him.

Kabir Ji says that as long as the Satguru gives spiritual strength, then subject disorder remains but can’t be subdued. Just as light is given in a dark room, the room gets illuminated, but this does not mean that darkness does not exist there. He keeps waiting for his turn. Where light intensity decreases, it shows its emphasis. Therefore, in order to keep the heart continuously published, it is necessary to receive the “Namdan” from Satguru so that consciousness is always awake.

Kabir puts his point in front of society through a couplet-

 “गुरु हैं बड़े गोविंद से, मन में देख विचार।

हरि सुमिरे तो वार हैं, गुरु सुमिरे तो पार।

That is, the position of the Satguru is higher than the ocean. If you worship only the God, then your welfare will be there but if you are in the protection of Satguru then you will also cross the world and found the right destination.

सतगुरु की महिमा

वर्तमान में जितने भी साधन मौजूद हैं, वे सब आत्मा को मोक्ष दिलाने में सक्षम नहीं हैं। इन साधनों के प्रचलन के पीछे स्वार्थ छिपा है। इन साधनों को साधकों ने अपनी स्वार्थपूर्ति के लिये बनाया है। इसलिये जिस समाज ने भी इन साधनों को अपनाया, वह भ्रमित हो गया है। चाहे अनचाहे मनुष्य वहीं पर उलझ के रह जाता है। इसका मतलब है कि इस भृम को समाप्त करने के लिये हमको किसी सतगुरु की आवश्यकता पड़ेगी।

सतगुरु के भीतर गुणवत्ता का होना आवश्यक है। ऐसा गुरु चाहिए जो स्वार्थी, लालची न हो। वह पेट पालने के लिये गुरु न बना हो। वह साधारण मनुष्यों जैसा साधारण जीवन न बिता रहे हो। वह धन के पीछे भागने वाला न हो। उसमें परिवारवाद न हो। यदि उसमें किसी सतगुरु के लक्षण न दिखाई दें तो वह सच्चा तत्व ज्ञान आपको प्रदान नहीं कर सकता।

गुरु का चुनाव करना बहुत ही जरुरी है। गुरु केवल परमात्मा को पाने का रास्ता और ध्यान विधि ही नहीं बताता बल्कि इस संसार सागर से पर करने की युक्ति भी बताता है। धर्मशास्त्रों में गुरु की बहुत महिमा बताई गई है लेकिन कबीर जी ने गुरु को भगवान से भी ऊंचा स्थान दिया है। वे कहते हैं कि यदि संसार के सभी पेड़ों की कलम बना दी जाये और समुन्द्र को श्याही भी बना दिया जाए, तब भी गुरु की महिमा लिखी नहीं जा सकती।

कबीर के अनुसार सतगुरु के पास एक ऐसा गुण होता है जिससे वह हमें संसार सागर से पार कर देते हैं। जिस प्रकार एक भृंगा कीड़ा अपनी आवाज़ सुनाकर दूसरे जीव के लार्वे को अपनी ही तरह बना देता है, जैसे पारस पत्थर के संपर्क में आकर लोहा सोने में बदल जाता है, जैसे हंस दूध और पानी को अलग-अलग कर देता है, ठीक उसी प्रकार सतगुरु की शरण मिलने के बाद मनुष्य भी संसार सागर के सभी बन्धनों से मुक्त हो जाता है। मुक्ति का दाता सतगुरु को ही कहा गया है।

सतगुरु के पास एक विशेष युक्ति होती है जिसे “ नामदान “ कहते हैं। इस नामदान के माध्यम से सतगुरु भक्त का हृदय प्रकाशित कर देता है जैसे किसी कमरे के अंधकार को समाप्त करने के लिये रोशनी की आवश्यकता पड़ती है, वैसे ही हृदय को प्रकाशित को प्रकाशित करने के लिए सतगुरु द्वारा दिये नामदान की आवश्यकता पड़ती है। हृदय के अंधकार को कोई बाहरी रोशनी जैसे सूर्य, चन्द्र की रोशनी भी प्रकाशित नहीं कर सकती।

गुरु के पास ध्यान और चेतना की बहुत ज़्यादा शक्ति होती है। जब सतगुरु अपने इस गुण को धारण कर शिक्षा देते हैं तो मनुष्य का अंतःकरण शुद्ध होने लगता है और हृदय में प्रकाश उतपन्न होने लगता है। इसकी रोशनी में हृदय के अंदर के माया, ममता, काम, क्रोध, लोभ, मोह जैसे विकार दिखाई देने लगते हैं। यह विकार पहले दिमाग से समझ नहीं आ रहे थे। वह सावधान हो जाता है

जब मनुष्य चलता है तो असावधानी के कारण ही उसके पैर में पत्थर टकरा जाता है, नहीं दिखाई देने के कारण वह गिर जाता है परंतु जब होने वाली दुर्घटना का पहले से अनुमान हो तो दुर्घटना होने से पहले मनुष्य सावधान हो जाता है तो उसका चलना आसान हो जाता है। गुरु का हृदय स्वयं प्रकाशित होता है जिस कारण वह दूसरे के हृदय को भी प्रकाशवान बना पाने में सक्षम होता है। इसलिये सतगुरु की स्तुति की जाती है।

दुनिया के जितने भी काम हो रहे हैं वे सब ध्यान के माध्यम से हो रहे हैं। परमाणु बम बनाने वाले ने भी उसे इस प्रकार बनाया है कि वह अपने आप ही न फूटे। इसी प्रकार सतगुरु भी अपने ध्यान के माध्यम से हृदय प्रकाशित करते हैं ताकि वह आसानी से अंधकारमय न हो। जिस प्रकार आज तक कोई वैज्ञानिक मोती नहीं बना पाया लेकिन एक छोटी सी सीप ये काम आसानी से कर लेती है क्योंकि उसके अंदर यह क्षमता मौजूद होती है। यही कार्य सतगुरु भी करते हैं।

एक अंधा व्यक्ति कितनी भी सावधानी से चले, एक न एक दिन उसको ठोकर जरूर लगती है इसी प्रकार कितना भी बड़ा विद्वान हो, वह अपना हृदय स्वयं प्रकाशित नहीं कर सकता। जब तक उसके अंदर आध्यात्मिक ताक़त नहीं आएगी तब तक उसके लिये यह काम असम्भव है।

कबीर जी कहते हैं कि जब तक सतगुरु आध्यात्मिक ताक़त देता है तो बिषय विकार तो रहते ही हैं पर उनका वश नहीं चलता है। जिस प्रकार एक अंधकार कमरे में रोशनी दी जाती है तो कमरा रोशन तो हो जाता है पर इसका मतलब ये नहीं कि वहां अंधकार मौजूद नहीं है। वह अपनी बारी की प्रतीक्षा करता रहता है। जहाँ प्रकाश की तीव्रता कम हो जाती है,वह अपना जोर दिखा ही देता है। इसलिए हृदय को लगातार प्रकाशित रखने के लिए सतगुरु से प्राप्त नामदान आवश्यक है ताकि चेतना हमेशा जागृत रहे। इस प्रकार सतगुरु और अन्य आचार्यों के बीच अंतर हो जाता है।

कबीर एक दोहे के माध्यम से अपनी बात समाज के सामने रखते है-

“गुरु हैं बड़े गोविंद से, मन में देख विचार।
हरि सुमिरे तो वार हैं, गुरु सुमिरे तो पार।

  यानी गुरु का स्थान ईस्वर से भी ऊँचा है। यदि आप केवल ईस्वर की आराधना करते हैं तो आपका कल्याण होगा परन्तु यदि आप सतगुरु की शरण में हैं तो आप संसार सागर से भी पार हो जाओगे।






 
 

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