Subject & Disorder

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To know the physical form information, situation and origin  of five material elements  in whole body,  like about presence of soil, water, air, fire and sky and the working nature of the working body through sexual organs, anger, greed, attachment and ego, The knowledge of Gyana senses such as the eyes, ears, nails, mouth and skin, and the five karma senses such as arms, legs, mouth, stool and bladder and the four senses of the senses such as mind, intellect, memory and activity,  In this stage the consciousness becomes awakened. When consciousness is awakened, then the difference between mind and spirit is revealed. At this stage, the mind of an organism becomes powerless in seeking its body’s desired purpose and comes fully into the control of the soul gradually. The organism seems to follow the orders of meditation instead of the mind in the living state. The power of the mind gets impaired and the self power prevails.

The complete mitigation of the mind is as follows –

1. If there is no focus on the absolute trust on Supreme God, and anything else other than that, the subject of the work of the body sex become silent.

2. If there is no hope other than a Supreme God, then the anger of the creature ends.

3. By acquiring knowledge of all other things except mortals, knowing the mortal gets rid of the covetousness of the organism.

4. After knowing the mortality of the body and the world and the mortality of every physical thing related to these mortal things, the cure for the organism ends.

5. After knowing that I am a body, but not a soul, it is a complete body mind and this body-mind does all the activities for the fulfillment of its fulfillment. When the knowledge of it comes, the ego’s ego ends. Ego means action.

Sant Kabir Ji quote that “Without intelligence, without stray, what is Mathura and Kasi?” .


हिंदी अनुवाद—-

मन के भौतिक स्वरूप में मौजूद तत्व जैसे पृथ्वी, जल, वायु, अग्नि और आकास की शरीर व संसार में स्थान की जानकारी व उत्पत्ति को जानने तथा मन की वृत्तियों जैसे काम, क्रोध, लोभ, मोह ओर अहंकार द्वारा विषयों की पूर्ति के लिए पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ जैसे आंख, कान, नाख, मुँह और त्वचा तथा पाँच कर्मेंद्रियों जैसे हाथ, पैर, मुँह,मल द्वार व मूत्राशय तथा चार अन्तःकरण की इंद्रियों जैसे मन, बुद्धि, चित्त और अहंकार की कार्य करने की प्रक्रिया और कार्य उद्देश्य को सही ढंग से समझने तथा सूक्ष्म इंद्रियों द्वारा छोड़ी गई तरंगों का अक्षरतया पालन करने की विधि को ध्यानपूर्वक समझने के बाद मन और आत्मा के अगल अलग होने का दर्शन हो जाता है। इस अवस्था में चेतना जागृत हो जाती है। चेतना जागृत होने पर मन और आत्मा का अंतर पता चलता है। इस अवस्था में जीव का मन उसके शरीर को मनचाहा कार्य कराने में शक्तिहीन हो जाता है और पूर्णतया धीरे धीरे आत्मा के नियंत्रण में आ जाता है । जीव जीवित अवस्था में मन के बजाय ध्यान के आदेशों का पालन करने लगता है। मन की शक्ति क्षीण हो जाती है और आत्म शक्ति प्रबल हो जाती है।

मन का पूर्ण शमन निम्न प्रकार होता है —

1. एक परमपिता पर पूर्ण विश्वास और उसके सिवाय किसी भी अन्य चीज़ पर ध्यान केंद्रित न होने पर जीव का काम रूपी विषय समाप्त हो जाता है।

2. एक हो परमपिता के सिवाय किसी और से कोई उम्मीद न होने पर जीव का क्रोध रूपी विषय समाप्त हो जाता है।

3. एक हो परमपिता के सिवाय अन्य सभी चीजों को नश्वर जानने का ज्ञान पाकर जीव का लोभ रूपी विकार समाप्त हो जाता है।

4. मन और माया यानी शरीर व संसार के नश्वर होने और इन नश्वर चीजों से संबंध रखने वाली प्रत्येक भौतिक वस्तुओं के भी नश्वर होने का ज्ञान पाकर जीव का लोभ संबंधी विकार समाप्त हो जाता है।

5. यह जानने के बाद कि मैं शरीर नहीं बल्कि आत्मा हूँ, यह पूरा शरीर मन है और यह शरीर रूपी मन अपनी वृतियों की पूर्ति  के लिये जीवनभर क्रियाएँ करता है, इसका ज्ञान हो जाने पर जीव का अहंकार समाप्त हो जाता है। अहंकार मतलब क्रिया।

संत कबीर साहिब ने कहा है कि ” आत्मज्ञान बिना नर भटके, क्या मथुरा क्या कासी।”

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