The internal arrangement of the elements

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What is the Difference between the Soul and the Spirit

The internal arrangement of the elements is the mind and the external quality is the body. For example, this body composed of five elements respectively earth, water, air, fire and sky will be called body and its inner sense i.e thinking, understanding, deciding, feeling, action and reaction will be called mind because these are all qualities of the body.

तत्वों की आंतरिक व्यवस्था का भीतरी गुण मन तथा बाहरी गुण शरीर है। जैसे कि पाँच तत्वों क्रमशः पृथ्वी, जल, वायु, अग्नि और आकाश से बना यह पिंड शरीर कहलायेगा और इसके भीतर का भाव यानि सोचना, समझना, विचार करना, निर्णय लेना, महसूस करना,  क्रिया व प्रतिक्रिया करना मन कहलायेगा। ये सब शरीर के गुण हैं।

Element master knows that a element named Noori (Sharp beam) is present in Satyaloka, located above the world of Brahma’s region. It has light equal to 16 suns. It is also clear that where there is an element present, there is a mind but in every world there are different types of mind.

तत्वदर्शी जानते हैं कि ब्रह्म लोक से ऊपर के लोक में स्थित सत्यलोक में नूरी तत्व (तेज पुण्ज) विद्यमान है। उसमें 16 सूर्यों के बराबर प्रकाश मौजूद है। जहाँ तत्व है वहाँ मन है किंतु हर लोक में मन के प्रकार अलग-अलग हैं।

फोटो: अंतरिक्ष में जाने के बाद ...
sharp beam

According to the Vedas, several layers of elements have climbed over our mind. Such as subtle body, gross body, causal body, supernatural body, noori body, great noori body, etc. In this way, the eternal layer has climbed. Therefore the universes of mind are infinite.

वेदों के अनुसार हमारे मन के ऊपर बहुत सारे तत्वों की परत चढ़ी हुई है। जैसे सूक्ष्म शरीर, स्थूल शरीर, कारण शरीर, महाकारण शरीर, केवल्य शरीर, नूरी शरीर, महानूरी शरीर, इत्यादि। इस प्रकार अनन्त परत चढ़ी हैं। इसलिए मन के लोक अनन्त हैं।

exploring energy body

When a person leaves his body and travels from this world to the heaven world, hell world or the world above it, the soul starts wearing a subtle body. When the soul leaves the subtle body and moves towards the causal body, it assumes a more subtle body. The body attaining this state is smaller than the subtle body.

जीव अपना शरीर छोड़कर जब इस लोक से स्वर्ग लोक, नरक लोक या उसके ऊपर के लोकों की तरफ यात्रा करता है तो आत्मा सूक्ष्म शरीर को धारण करने लगती है। आत्मा जब सूक्ष्म शरीर को छोड़कर कारण शरीर की ओर बढ़ती है तो एक और सूक्ष्म शरीर धारण कर लेती है। इस अवस्था को प्राप्त होने वाला शरीर सूक्ष्म शरीर से और छोटा होता है।

In this way, the subtle body bears a soul till the number which is equal to one divided by thousand quadrillion. That subtle body bears a soul. As long as there is a covering of the mind above the soul, it does not change into the ultimate pure soul.

इस प्रकार 16 संख कोश दूर यानी 16 की संख्या को जब 1000 के आगे 15 शून्य की संख्या से भाग देने पर जो संख्या आएगी, वहां तक मन के वास है। उतने सूक्ष्म शरीर एक आत्मा धारण करती है। जब तक आत्मा से ऊपर मन का आवरण रहता है तब तक वह परम शुद्ध आत्मा में परिवर्तित नहीं होती।

The pure soul is immaterial. This state is attained by enlightenment when the soul becomes devoid of pride. The mind feels it. The mind feel it just like to smell, see, taste, listen, perform action, resolve, etc.

परम् शुद्ध आत्मा तत्वहीन है। यह अवस्था आत्मज्ञान से प्राप्त होती है। जब जीवात्मा अभिमान रहित हो जाती है। इसका अनुभव मन करता है। अनुभव करना मन का विषय है। जिस प्रकार मन के अन्य विषय देखना, सूंघना, स्वाद लेना, श्रवण करना, क्रिया करना, संकल्प करना इत्यादि हैं।

The system of elements is very expansionary. As the element attains fineness, the gross element that was formerly held in it, destroys it. In the same way, as the body gets to the subtlety, its joy increases. To rejoice is a matter of mind. This is why the mind is unstable while the soul is stable.

What is a soul, and does it exist? - Quora

तत्वों की व्यवस्था बहुत विस्तारवादी है। जैसे-जैसे तत्व सूक्ष्मता को प्राप्त होता है, उसका पूर्व में धारण किया स्थूल तत्व नष्टता को प्राप्त होता रहता है। इसी प्रकार शरीर जैसे-जैसे अति सूक्ष्मता को प्राप्त होता है उसका आनन्द बढ़ता जाता है। आनन्दित होना मन का विषय है। इसी कारण मन अस्थिर है जबकि आत्मा स्थिर।

The joy of the soul is never more or less. He is eternal, his joy is everlasting. He is beyond these states. Vedas also called this knowledge neti-neti, that is, it is not the last.

आत्मा का आनन्द कभी कम या ज्यादा नहीं होता। वह नित्य है उसका आनन्द चिरस्थायी है। वह इन अवस्थाओं से परे है। वेदों में भी इस ज्ञान को नेति-नेति कहा यानि कुछ और है यह इति नहीं है।

The soul has to go from one floor to another. Each floor is like a halt. At every stage, the individual soul has to rest for some time and keep moving forward. The learned people say that the attainment of the ultimate truth will be the option of neti. There is a law to travel from religion to wealth, from wealth to desire, from desire to salvation (the ultimate divine state which actually is difficult to express in words.)

जीवात्मा को एक मंज़िल से दूसरी मंजिल तक चलते जाना है। हर मंज़िल एक पड़ाव जैसा है। हर पड़ाव पर जीवात्मा को कुछ देर आराम करके आगे बढ़ते जाना है। ज्ञानी जन कहते हैं कि अंतिम सत्य की प्राप्ति नेति का विकल्प होगा। धर्म से अर्थ, अर्थ से काम, काम से मोक्ष तक यात्रा का विधान है। (परम दिव्य अवस्था जो वास्तव में शब्दों में व्यक्त करना कठिन है)।

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