The Mystery of Jagannath Puri Temple

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“Yog jeet Kabir ” was one of the seven incarnations of the “Supreme God” (Satpurush). In every age, people are incarnated to give knowledge of the truth. They came in the name of “Sat Sukrit” in Satyuga, “Karunamaya” in Dwapar era, “Munindra” in the Treta era and Kabir in the Kaliyuga.

Reaching to Dwarka Puri, Shri Krishna ( A major deity in Hinduism. He is worshiped as the eighth incarnate of the God Vishnu) freed six hundred and fifty million Yaduvanshi ( various Rajput groups )  with curse of lord Brahm ( when Satpurush had called five words, Jyoti Niranjana  was born. Which is also called Brahm. He is the word’s operator).

Later Shri Krishna died by the hands of Shabar ( A Hunter). The charioteer of Sri Krishna, whose name was Darul, He burnt the body of Shri Krishna on fear but the whole body did not burn. He put the corpse into the vessel and sacked it in the sea.

Hearing  Shri Krishna’s death, Pandavas( They are the five acknowledged sons of Pandu, by his two wives Kunti and Madri, who was the princess)  were very sad and handed over his kingdom to Parikshit (He was a Kuru king who reigned during the Middle Vedic period 12th-9th centuries BCE) and all five brothers went to the Himalayas of Uttarakhand near Badrinath ( This is a holy temple of Lord Vishnu  in Chamoli district in the state of Uttarakhand, India ) to smelt them with Draupadi ( wife of Pandavas and She is the most important female character in the Hindu epic, Mahabharata ).  Pandava went to heaven through heaven stairs. Whose marks are still present there.

The body of Shri Krishna reached the banks of the sea in the Purushottam Puri situated in the west of India. The king of Purushottam puri was  Gaal Madhav. On that day it was a dream that you will find a manger on the shore of the sea. You make my temple there,  I will be called a Buddhist form. King Gaal Madhav and his brother Neel Madhav built a temple. The temple is famous today by the name of Bedi Hanuman. When the temple was ready, the waves of the sea broke it. Rebuild again then the waves broke. The temple was built six times. King Gaal Madhav died and Neel Madhav became the king of Purushottam Puri. His son’s name was Indradman.

Satguru Kabir had a talk with Brahm in Dwapar era, Brahm took the pledge to build his temple from  Karunamaya Kabir. To fulfill his promise, Kabir came from Satylok and threw his yoke on the shore and sat down there in  Padmasana (  Lotus position is a cross-legged yoga posture which helps deepen meditation by calming the mind and alleviating various physical ailment).

Seeing such a saint, the people tell this incident told to the king. King Neel Madhav arrived immediately there and fell at the feet of sage Karunamaya Kabir. He said  King to make temple soon. The King said that he built a temple six times, but every time the sea waves broke it. He directed king to make it again. King said he has no wealth.

Karunamaya Kabir asked to check them sea front, go there and watch the dug. The King went and removed the send and saw a lot of diamond pearls inside. The king said, yes, these are sufficient to make temple but your grace is necessary. Do not let the sea again break the temple. The king made the foundation of one hundred and twenty-five hands. He built a temple with a hundred and twenty hands high on it.

The waves of the sea were not able to come forward with their plucked Yod. To make statues according to the rules,  King brought the wood of the “Daru Brahma“(Neem Tree wood)  and kept in the site the temple. Karunamaya told the king not to open the doors of the temple for sixteen days. I will make sculptures myself.

After thirteen days passed, Gorakhnath (He was a Hindu yogi and saint who was the influential founder of the Nath Hindu monastic movement in India) came to the temple and opened the door, I have to see the temple. The king kept his talk and said that Karunamaya is making sculptures inside and has ordered to not open the door for sixteen days and I have said to follow order strictly.

Gorakhnath got angry and kicked the door with a loud blow. Went inside, he saw three idols named (Sri Krishna, brother Balaram, and sister Subhadra) were incomplete. Hand and legs were not made except round face and round eyes. The king said now these scriptures will remain incomplete and will remain the same in future.

The king also got angry and said that I will make all saints scriptures here except Gorakh’s. Gorakhnath says on whose strength are you saying this? The King replied I am speaking on the strength of Karunamaya Kabir. Gorakhnath says where is he? Call him.

Hearing this Karunamaya Kabir came there.  Gorakh recognized him and he apologized for touching his feet. Karunamaya Kabir said Anyone here will be free to visit the idols. There will be no idea of any caste here. There will be no special rule to worship idols. whoever will come here with true desire, with the intentions, his prayers will certainly be fulfilled. Saying this he becomes disappeared. Gorakh Ji went to Uttarakhand and later King Neel Madhav also died.

The temple is still present here. So many people come here to make their dreams true. It is said they who come here with the true heart, his desires surely fulfilled.

Bedi Hanuman Temple

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Hindi Translation-

योगजीत कबीर पूर्ण पिता परमेश्वर (सतपुरुष) के सात अवतारों में से एक थे। वह हर युग में जीवों को सत्य ज्ञान देने के लिये अवतरित हुए। वे सतयुग में सत सुकृत नाम से, द्वापर युग में करुणामय नाम से, त्रेता युग में मुनीन्द्र नाम से तथा कलयुग में कबीर नाम से पुकारे जाते हैं।

द्वारिकापुरी जाकर श्री कृष्ण ने ब्रह्मश्राप से ग्रसित छप्पन करोड़ यदुवंशियों को मुक्त कर दिया। बाद में शबर के हाथों श्री कृष्ण की मृत्यु हुई।  श्री कृष्ण के सारथी जिसका नाम दारुक था, उसने डर के मारे श्री कृष्ण के शव को जलाया तो वह नहीं जला। उसने शव को संदूक में डालकर समुन्दर में बहा दिया।

श्री कृष्ण की मृत्यु की सूचना पाकर पांडवों को बहुत दुख हुआ और इक्यासी वर्ष के राज काज को परीक्षित को सौंप दिया और पांचो भाई द्रौपदी संग अपने को गलाने के लिए उत्तराखंड के हिमालय में गये। वहाँ बद्रीनाथ के पास स्वर्गारोहिणी के रास्ते स्वर्ग को चले गये। जिसके निसान आज भी वहाँ मौजूद हैं।

श्री कृष्ण का शव भारत के पश्चिम में स्थित पुरुषोत्तमपुरी में समुन्द्र के किनारे पहुंचा। पुरुषोत्तमपुरी के राजा का नाम गाल माधव था। उसको उसी दिन स्वप्न हुआ था कि तुझे समुन्द्र के किनारे एक बक्शा मिलेगा। तुम वहाँ मेरा मंदिर बनाना। मैं बौद्ध रूप कहलाऊंगा। राजा गाल माधव और उसके भाई नील माधव ने मंदिर बनवाया। वह मंदिर आज कल बेड़ी हनुमान नाम से प्रसिद्ध है। जब मंदिर तैयार हुआ तो समुन्द्र की लहरों ने उसको तोड़ दिया। फिर से बनवाया तो फिर लहरों ने तोड़ दिया। इस प्रकार कुल छ बार उस मंदिर को बनवाया गया।  गाल माधव राजा की मृत्यु हो गयी। नील माधव पुरुषोत्तमपुरी के राजा बने। उनके पुत्र का नाम इन्द्रदमन था।

सतगुरु कबीर की काल निरंजन ( सृष्टि रचना के समय सतपुरुष ने पांच शब्द पुकारे थे, पांचवे शब्द से ज्योति निरंजन काल पैदा हुए । जिनको ब्रह्म के नाम से भी जाना जाता है। यही इस संसार के संचालक हैं) से वार्ता हुई थी। द्वापर युग में काल निरंजन ब्रह्म ने करुणामय कबीर से उनका मंदिर बनाने का वचन लिया था। अपना वचन निभाने के लिए  सत्यलोक से योगजीत कबीर , कबीर नाम से अवतरित होकर आये और समुन्द्र के किनारे अपना योगदण्ड गाड़ दिया। और खुद पद्मासन लगाकर जमीन से सवा हाथ ऊपर बैठ गये। ऐसे संत को देखकर लोगों ने राजा को ये बात बताई।  राजा नील माधव सुनते ही वहाँ पहुंचा और सतगुरु के चरणों में गिर गया।  तब सतगुरु ने कहा कि मंदिर तैयार करो। राजा बोला हे सतगुरु हमने छ बार मंदिर बनाया पर हर बार समुन्द्र ने तोड़ दिया। सतगुरु ने कहा फिर से बनवाओ। राजा बोला धन नहीं है। सतगुरु बोले सांमने बालू पड़ी है , जाकर जरा उनके नीचे देखो। राजा ने ठीक वैसा ही किया। राजा को वहाँ बहुत सारे हीरे मोती दिखाई दिये। राजा बोला अब मंदिर तो बन जायेगा पर आपकी कृपा जरूरी है। कहीं ऐसा न हो समुन्द्र फिर से मंदिर को तोड़ दे।  राजा ने एक सौ पचीस हाथ की बुनियाद बनवाई। ओर उसके ऊपर एक सौ पचीस हाथ ऊंचा मंदिर बनवाया। समुन्द्र भी कभी कबीर के गाड़े योगदण्ड से आगे नहीं आ पाया।

मूर्तियों को बनाने के लिए दारू ब्रह्म की लकड़ी मंदिर में रखवाई।  कबीर ने राजा से कहा सोलह दिन तक मंदिर के दरवाजों को खोलना नहीं। मैं स्वयं मूर्तियां बनाऊंगा।  तेरह दिन बीत जाने के बाद गोरखनाथ जी मंदिर में आये और बोले दरवाज़ा खोलो, मुझे मंदिर देखना है। राजा ने अपनी बात रखी और कहा कि अंदर सतगुरु मूर्तियां बना रहे है और उन्होंने कहा है कि सोलह दिन तक दरवाज़ा मत खोलना। सतगुरु का हुक्म नहीं है।

गोरखनाथ को क्रोध आ गया और दरवाज़े पर जोर से लात मारकर तोड़ दिया। अंदर जाकर देखा तो तीनों मूर्तियां ( श्री कृष्ण, बड़े भाई बलराम और बहिन सुभद्रा)  अधूरी थीं।  उनके हाथ पैर की उंगलियां नहीं बनी थीं। राजा बोले आपने दरवाज़ा तोड़ दिया, अब ये मूर्तियां नहीं बन पाएंगी । राजा को गुस्सा आ गया और बोले सब साधुओं का स्थान बनाएंगे पर गोरख का स्थान नहीं बनायेगे।  गोरखनाथ कहते है तुम ये बात किसके बल पर कह रहे हो? राजा बोला कबीर के बल पर कह रहा हूँ। गोरखनाथ  बोले कहाँ है ?  सांमने लाओ। कबीर  गोरखनाथ के सामने आये तो गोरख ने पहचान लिया। गोरखनाथ ने कबीर के पैर छुवे ओर माफी मांगी।

तब कबीर ने कहा यहाँ कोई भी आकर मूर्तियों के दर्शन करने के लिए स्वतंत्र रहेगा। यहाँ कोई जाति पाती का विचार नहीं होगा। मूर्तियों को पूजने का कोई विशेष नियम नहीं होगा। जो भी यहाँ सच्चे मन से मुरादें लेकर आयेगा, उसकी मुरादें अवश्य पूरी होंगी।ऐसा कह कबीर अन्तर्ध्यान हो गये। गोरखजी उत्तराखंड को चले गये ओर बाद मैं नील माधव की भी मृत्यु हो गयी।

यह मंदिर वहां आज भी मौज़ूद है और बहुत सारे लोग अपने सपने को सच करने के लिये वहां आते हैं। कहा जाता है कि यहां आने वालों की मन की मुरादें अवश्य पूरी होती हैं।

 

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