The truth of world

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There is a dialogue in Yoga Vashishtha Ramayana about the truth of the world. In which Ram told his master that this world is very painful and the ocean of sorrows. Vashishtha said, ‘O’ Ram, what world are you talking about? This world has not happened. No, it was earlier, neither is it nor will it be in the future. Therefore, which was not already there and it is not even last, so its present also is confused. This world seems real to you because of confusion.

Ram ji said that how it can be possible; you are my master guru, my mother, my father, my friends, my sweetheart, this sun, this moon etc. This is what is being said, what is this?

Vashishtha said that hey Ram, what you think is real, is the imagination of your mind, your heart is the superintendence of mind. Therefore, if you will control the mind, then this world will disappear. Hey Ram, do you want to know this horoscope in real life or just believe that this world is really a mistake! If this world is falsely this is proof, it is necessary to know about.

If we contemplate the words of scriptures and great men, then it is revealed that in real this universe is a dream. We have been reading it, we have been listening to it, but we are not doing it. Our beliefs are somewhat different from this world. We are not assuming anything dreaming in this world, but are continually considered. This dilemma has come and no one is able to explain it.

Kabir ji told to devotees and resolved their doubts. He said that first of all we see how we are talking about this world. How is this world feeling to us? How is it

In every creature of the world, the senses that exist are total fourteen. Of which the eyes, ears, nails, mouth and skin are these five sensory centres, whereby the brain has knowledge of something.

The hands, feet, the entrance, the anus, and the Mouth is the words through which the man speaks. The mind, the intellect, the mind, and the ego, these four senses are the senses of intercession that govern the creature. The lord of all the senses has the mind. Whatever senses the mind makes, all the senses start doing their work? The soul is different. The power of the soulProvide strength to the mind. Just like the vehicle gets energy from the fuel.

If we look like a crisp, then its medium is nose. As we listen the words by the ear, taste with tongue, etc. The world is experiencing similarity with us. We all know that this is my father, my brother, my house, I am citizen of here. It is this roughly the introduction of ours. All this is a game of our mind and senses. The sense of this world is happening to us due to these senses.

When we saw our mother or father, we are saying that this is my mother, this is my father. What is the reason behind this recognition? Our eyes have seen, it is knowledge oriented.  He brought a picture to our eyes. Memory immediately said that this is my mother. In identifying mother, we had an equal mix imagination of knowledge and mind. This shows that we are doing the senses of this world with the help of our senses, namely, Gyanendri, Karmendri, intercession. Our soul has no relation with them. We can also have a direct perception of this.

Kabir ji told that the human mind has capacity to keep two trillion things. Whatever we saw, which are shown by the eyes, are recorded in the mind. This is also called Chitragupta. It keeps all stored in it. The cells of our mind also experience very old things. For this reason, the things we see are considered to be real.

Just like in the night, the dream scene at night reflects the truth on rising in the morning, but it is not true. Similarly, this world also seems real to us, whereas in reality, it is only the imagination of our brain.

Some seekers can awaken their pineal gland i.e. Aagya chakra through yoga meditation, which is also called third eye. On whose openness the truth is seen andthe world is seen to be false. Such seekers can easily see the reality of present, thepast and the future or the upcoming events of the future.

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संसार एक मिथ्या

योगा विशिष्ठ रामायण में एक संवाद आता है जिसमें राम जी ने अपने गुरु से कहा कि यह संसार अति पीड़ादायक और दुखों का सागर है। वशिष्ठ जी ने कहा कि हे राम तुम किस संसार की बात कर रहे हो? यह संसार तो हुआ ही नहीं है। ना ये पहले था, ना ये है और न भविष्य में होगा। इसलिये जो पहले ही नहीं था और इसका आखिरी भी नहीं है, इसलिये इसका वर्तमान भी भ्रमित है। तुमको भृम के कारण यह संसार वास्तविक लग रहा है।

राम जी ने कहा कि हे गुरुवर ये माता, पिता, बन्धु, सखा, मित्र, सूर्य, चाँद आदि ये आप और मैं, जो आभाष हो रहा है, ये क्या है?

वशिष्ठ जी ने कहा कि हे राम जिसे तुम वास्तविक समझ रहे हो ये तुम्हारे चित्त की कल्पना है, तुम्हारे चित्त की सुपर्णा है। इसलिये तुम चित्त का निग्रह करोगे तो ये संसार मिट जायेगा। हे राम क्या आप इस भृम को यथार्थ रूप में देखना जानना चाहते हो या केवल मान लोगे कि ये संसार वास्तव में एक मिथ्या है! अगर यह संसार मिथ्या है। इसका प्रमाण है, यह जानना आवश्यक है।

यदि हम शास्त्रों और महापुरुषों की वाणी का चिन्तन करते है तो इस बात का पता चलता है कि यथार्थ में यह जगत स्वप्न है। हम लोग इसको पढ़ भी रहे है, सुन भी रहे है परन्तु विस्वास नहीं कर रहे हैं। हमारी मान्यतायें इस जगत के प्रति कुछ भिन्न हैं। हम इस संसार में कुछ भी स्वप्नवत नहीं मान रहे हैं बल्कि नित्य मान रहे हैं। यह दुविधा आ गयी है और इसको समझाने वाला कोई नहीं मिल रहा है।

कबीर जी ने इस भृम को भक्तों को बताया और उनकी शंका का समाधान किया। उन्होंने कहा कि सबसे पहले हम यह देखते हैं कि इस संसार का आभाष हम कैसे कर रहे हैं, यह जगत हमको कैसे लग रहा है, इसकी अनुभूती हमको कैसे हो रही है? इसका सूत्र क्या है?

जगत के हर प्राणी में जिन इन्द्रियों का वजूद है वह कुल चौदह हैं। जिनमें से आंख, कान, नाख, मुँह ओर त्वचा ये पाँच ज्ञानेन्द्री है जिससे मस्तिक्ष को किसी वस्तु का ज्ञान होता है। हाथ, पैर, मुत्रद्वार, मलद्वार और बोलने के लिये मुँह ये कर्मेन्द्रियाँ हैं जिसके माध्यम से मस्तिक्ष कार्य करता है। मन,बुद्धि, चित्त और अहंकार ये चारों इन्द्रियाँ अन्तःकरण की इन्द्रियाँ है जो मस्तिक्ष का संचालित करती हैं। सारी इन्द्रियाँ का स्वामी मन है। मन जो भी संकल्प करता है सभी इन्द्रियाँ अपना काम करने लगती हैं। आत्मा अलग है। आत्मा की शक्ति से मन को शक्ति मिलती है। जैसे वाहन को ईंधन से ऊर्जा प्राप्त होती है।

हम खुसबू का आभास करते है तो उसका माध्यम नाख है। ऐसे ही हम शब्दों का आभाष कान से, जीभ से स्वाद इत्यादि का आभास करते हैं। जगत की अनुभूति भी हमको इसी तरह हो रही है। हम सब जानते है कि यह मेरे पिता हैं, भाई है, मेरा घर है, मैं यहां का रहने वाला हूँ। मोटे-मोटे तौर पर हमारा परिचय तो यही है। यह सब हमारी कर्मेन्द्रियों और ज्ञानेंद्रियों का खेल है। इस जगत का आभास हमको इन्ही इन्द्रियों के कारण से हो रहा है।

हमने अपनी माता या पिता को देखा तो हम कह रहे है कि ये मेरी माता है, ये मेरे पिता हैं। इस मान्यता के पीछे क्या कारण है। हमारी आंखों ने देखा, ये ज्ञानेन्द्री है। इन्होंने एक तस्वीर हमारी आंखों के पास पहुंचाई। चित्त ने तुरंत कहा कि यह मेरी माता है। माता को पहचानने में हमारी ज्ञानेन्द्री और चित्त का सममिश्रण था। इससे पता चलता है कि हम इस जगत की अनुभूति अपनी इन्द्रियों क्रमशः ज्ञानेन्द्री,कर्मेन्द्री, अन्तःकरण की सूक्ष्म इन्द्रियों से कर रहे हैं। हमारी आत्मा का इनसे कोई रिस्ता नहीँ है। इसकी हम प्रत्यक्ष अनुभूति भी कर सकते हैं।

कबीर जी ने बताया कि इंसान का चित्त दो खरब चीजों को रख सकता है। जो भी आंखों ने दिखाया, उसकी तस्वीर चित्त में प्रवेशित हो जाती है। इसको चित्रगुप्त भी कहते हैं। इसमें सब संग्रहित रहता है। हमारे मस्तिक्ष की कोशिकायें बहुत पुरानी चीजों का अनुभव भी कर लेती हैं। इस कारण से जिस चीज़ को हम देख लेते है उसी को वास्तविक मान लेते हैं। ठीक उसी तरह जैसे कभी रात को देखा गया सपना, सुबह उठने पर सत्य का आभास कराता है पर वो सत्य नहीं होता। इसी प्रकार यह संसार भी हमको वास्तविक लगता है जबकि वास्तविक रूप से यह हमारे मस्तिक्ष की कल्पना मात्र है।

कुछ साधक योग ध्यान साधना द्वारा अपनी पीनियल ग्लैंड यानी आज्ञा चक्र को जागृत कर पाते है जिसे तीसरी आँख भी कहा गया है। जिसके खुल जाने पर सत्य का दर्शन हो जाता है और यह संसार झूठ दिखाई देता है। ऐसे साधक वर्तमान, भूतकाल और अपने या दूसरे के भविष्य की बीती हुई या आने वाली घटनाओं को आसानी से देख पाते हैं।

...............ओम सत्य साहिब.................

 

 

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