The Unknown Secret of Mahabharata Part- 7

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To call a saint, King Yudhisthir sent his younger brother Bhim to Kashi. They arrived there and asked the people. They came to know that a saint has come in the shrine and they live there in a small cottage. Bhima went there and found Supasch Sudarshan worshiping. Bhim told him that the king of Indraprastha Yudhishthira is very pleased with you. You have invited there and have prepared fifty-six types of meals for you, so you come with me.

Supasch Sudarshan said that we do not want anything from the king. You can go. You killed your brothers and now sacrificing? Bhima got angry and started saying that elder brother Yudhishthira would be angry or else I split you. Sudarshan said that this is my garland made from the eighteen grains of Basil. You take it and went outside the cottage and sat down.

Bhima raised garland with his fingers, but he did not get up. Bhima had the power to equal ten thousand elephants. He picked up the garland with full force, but the garland still did not rise. Devotee Supach Sudarshan said that on the strength of this strength you were going to split me? Ashamed Bhima returned back to Indraprastha.

After reaching, Bhima told Dharmaraj Yudhishthira that the saint was not ready to come. Yudhishthira told Shri Krishna everything and asked what to do now? Shri Krishna said both you and Bhima, go to that saint and request them and bring them back.

Dharmaraj Yudhishthir touched the hands of Supasch Sudarshan but he did not allow touching them. He said with respect, maybe you are angry with Bhima’s mistake. You are very kind. I have killed my own brother relatives on the battlefield. The sin of killing him is upon me, so I have come to your shelter. We are doing Royal Yajna to be free from sin. If you come, our worship will be successful.

So listen to me, devotee Supach Sudarshan said, I will go with you guys but how will I go? My body is full of leprosy, wounds, and pimples. Dharmaraj Yudhishtir said that we do not care about it. You will take us on the shoulder and carry it. Bhima said that what you are saying, I put the full strength of my body but they have not even raised their wages, I can’t raise him. Dharmaraj said “O” Bheem, you showed your arrogance of power, and therefore you were defeated.

Sudarshan said that let’s pick me up. Bhima rested them on their shoulders comfortably. Now they are close to Indraprastha. Bhima said that at that time you must have done some mechanism in the garland so that it did not get up. Listening to Bhima comment, Sudarshan has raised his weight. Bhima was getting very trouble with the mounting load. He said that now no weight is being lifted from me. Sudarshan lost weight and became lighter. Then Bhima got him to the sacrificial place.

When the Pandavas saw the devotee Sudarshan, his physique was very bright. There were no disorders in his body. All the brothers met and respected the worshiper and worshiped him. Washing their feet and bowing their heads towards the head.

Queen Draupadi prepared the sixteen meals and kept it near the devotee. As Sudarshan mixed all kinds of food together then conch sounded three times. Draupadi came to mind that he mixed all the food together, even if he looks like a lower caste person, he knew about Droopy’s heart. Shri Krishna told Draupadi that now the conch is played only three times, so come and prepare fifty-six types of meals again.

Draupadi again prepared the meal and served Sudarshan. As soon as he mixed the food together so the conchs sound once again. The five Pandavas, Kunti, and Shri Krishna said with great humility, “O” Lord, we are very arrogant people. You are gentle compassionate. Have mercy on us.  For the third time, again, the variety of meals was prepared and offered to him. He raised the food with one hand and put it on the other hand but did not eat it. Finally the conch sound seven times and the sacrifice are complete.

Shri Krishna came to Dwarkiapapuri with his Yadav devotees. Dharmaraj Yudhishthira sealed it for one and a half years. After this, Pandava gave his rule to Parikshit and he went to heaven.

Thus Lord Vishnu liberated the earth from the evil people in Krishna’s form, established religion and also provided Lord Shankar with liberation from Brahmakpal’s sin.

महाभारत का अनजान रहस्य भाग-7

संत को बुलाने के लिए राजा युधिस्ठिर में अपने छोटे भाई भीम को कासीपुरी भेजा। वे वहां पहुंचे और लोगों से पूछा। उनको पता चला कि श्रपच मुहल्ले में एक संत आये हैं और वे वहाँ छोटी सी झोपड़ी में रहते हैं। भीम वहाँ गये और सुदर्शन को भजन करते हुए पाया। भीम ने सुदर्शन से कहा कि आपसे इंद्रप्रस्थ के राजा युधिस्ठिर जी बड़े प्रसन्न हैं। आपको बुलवाया है और छप्पन भोजन तैयार करवाया है इसलिए आप मेरे साथ चलिये ।

सुदर्शन ने कहा कि राजा से हमको कुछ नहीं चाहिए। तुम जा सकते हो।  अपने भाई बंधुओं को मारकर यज्ञ करते हो ? भीम को गुस्सा आ गया और कहने लगे कि बड़े भाई युधिस्ठिर नाराज़ न होते तो मैं तुमको यहीं पीस डालता। सुदर्शन ने कहा ये मेरी तुलसी के अट्ठारह दानों से बनी माला है तुम इसको ही ले जाओ और अपनी झोपड़ी के बाहर आकर बैठ गये।

भीम ने तुलसी की माला को अपनी उंगलियों से उठाया पर वह नहीं उठी। भीम को दस हज़ार हाथियों के बराबर ताक़त थी। उसने पूरी ताकत से माला को उठाया, पर माला फिर भी नहीं उठी। भक्त सुदर्शन ने कहा कि, क्या इसी ताक़त के बल पर तुम मुझे पीसने वाले थे ? भीम शर्माकर वापस इंद्रप्रस्थ चले गये। इंद्रप्रस्थ पहुंचकर भीम ने धर्मराज युधिस्ठिर से कहा कि संत आने को तैयार नहीं हैं।

युधिस्ठिर ने सारी बात श्री कृष्ण को बताई और पूछा कि अब क्या किया जाये?   श्री कृष्ण बोले आप और भीम दोनों उस संत के पास जाइये और उनको विनती करके ले आइये।

धर्मराज युधिष्ठिर ने हाथ जोड़कर सुदर्शन के चरण स्पर्श किये पर उन्होंने छूने नहीं दिया। वे बोले, हे स्वामी जी, शायद आप भीम की गलती से नाराज़ हैं। आप बहुत दयालू हैं। मैने लड़ाई के मैदान में अपने ही भाई बंधुओं की हत्या की है। मेरे ऊपर उनकी हत्या का पाप चढ़ा हुआ है इसलिये मै आपकी शरण में आया हूँ। पापमुक्त होने के लिए हम लोग यज्ञ कर रहे है। आप आएंगे तो यज्ञ सफल होगा।

इतना सुन भक्त सुदर्शन बोले अच्छा में तुम लोगों के साथ चलूँगा।  लेकिन मैं चलूँगा कैसे ? मेरा शरीर तो कोढ़, घाव, पीव से भरा है?

धर्मराज युधिष्ठिर बोले  हमको इसकी कोई परवाह नहीं। आपको  हम कंधे पर उठाकर ले चलेंगे। भीम ने कहा कि आप ये क्या कह रहे हैं,  मैंने अपने शरीर की पूरी ताकत लगा दी परंतु इनकी माला तक न उठी, इनको उठाना मेरे वस की बात नहीं है। धर्मराज बोले हे भीम तुमने अपनी ताकत का अहंकार दिखाया था इसलिये तुम परास्त हुए।

सुदर्शन ने कहा कि चलो मुझको उठाओ। भीम ने आराम से उनको अपने कंधे पर बैठा लिया। अब वे इंद्रप्रस्थ के नजदीक आ गये। भीम ने कहा उस समय आपने माला में जरूर कोई तंत्र किया होगा इसलिए वह नहीं उठी। ऐसा सुन भक्त सुदर्शन ने अपना वजन पहाड़ बराबर कर लिया। बढ़ते भार से भीम को बहुत परेशानी होने लगी थी। उन्होंने कहा कि अब मेरे से वजन उठाया नहीं जा रहा। सुदर्शन जी ने वजन घटा लिया और हल्के हो गये। तब जाकर भीम उनको यज्ञ स्थान तक ले जा पाया।

पांडव भाइयों ने जब भक्त सुदर्शन को देखा तो उनकी काया बहुत चमक रही थी। उनके शरीर में कोई भी विकार नहीं दिख रहे थे। सब भाइयों ने मिलकर भक्त जी का आदर सत्कार किया और पूजा की। उनके चरण धोये ओर प्रणाम कर चरणों के जल को अपने सिर पर लगाया।

रानी द्रोपदी ने छप्पन भोजन तैयार करके भक्त जी के पास रखे। भक्त सुदर्शन ने सभी प्रकार की चीज़ों को एक साथ मिला दिया तो तीन बार शंख बज उठा। द्रोपदी के मन में आया कि इन्होंने सारे खाने को एक साथ मिला दिया कहीं ये साधू नीच जाति का तो नहीं? भक्त  सुदर्शन ने  द्रोपदी के दिल की बात जान ली । श्री कृष्ण ने द्रौपदी से कहा कि अभी तो शंख केवल तीन बार ही बजा है, इसलिये एक बार फिर से छप्पन भोग तैयार करो।

द्रोपदी ने फिर से भोजन तैयार कर भक्त सुदर्शन के सांमने रख दिया। सुदर्शन ने जैसे ही भोजन को एक साथ मिलाया तो शंख एक बार फिर बज उठा। पांचों पांडव, कुंती, श्री कृष्ण बड़ी विनम्रता से कहने लगे , हे महाराज भक्त जी हम लोग अधम अभिमानी हैं। आप संत दयालु हैं। हम पर दया कीजिये।

तीसरी बार फिर से छप्पन भोग तैयार किये और उनको अर्पण करे। उन्होंने भोजन को एक हाथ से उठाया और दूसरे हाथ में रख लिया लेकिन खाया नहीं। सात बार शंख बोला और यज्ञ पूरा हुआ।

सब लोग भक्त सुदर्शन से पूछने लगे आपके लिए तीन बार छप्पन भोग बनवाये पर आपने भोजन हाथ में लिया और खाया नहीं ? भक्त सुदर्शन ने कहा कि आपने इतनी नम्रता से मुझे बुलाया इसलिए मेरा पेट तो वैसे ही भर गया।  सब लोगों ने मिलकर भक्त सुदर्शन की जय जयकार की और अपने अपने स्थानों को चले गये। भक्त सुदर्शन अन्तर्ध्यान हो गये।

श्री कृष्ण अपने यादव भक्तो के साथ द्वारिकापुरी को आ गये।  धर्मराज युधिस्ठिर ने उसके बाद इक्यासी वर्ष तक राज़ किया। इसके बाद पाँडव अपना राज परीक्षित को देकर स्वर्गारोहिणी को चल दिये।

इस प्रकार भगवान विष्णु ने कृष्ण रूप में लीला करके हुए पृथ्वी को दुष्ट लोगों से मुक्त कराया, धर्म की स्थापना की तथा भगवान शंकर को ब्रह्मकपाल के पाप से भी मुक्ति दिलायी।

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