Types of devotion

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Posture of devotion

Kabir Sahib said that there are two types of devotional are existing in this world which names are “Saguna” and “Nirguna” Bhakti.

Saguna devotion-

In this worship methodology, works of idol worship, pilgrimage, charity is being performed. Through this devotion man can attain the heavens, etc.. Because people of all faiths are trying to achieve heaven.

Nirguna devotion-

This devotion leads us towards five Mudra (posture of devotion). Khechri, Bhuchri, Chachari, Unmuni and Agochari, Lord Vishnu and Shankar ji were the biggest yogis of Khechari Mudra. Gorakhnath was the greatest yogi of Chachari Mudra. Shukdev ji was the greatest yogi of the Agochari posture. The biggest yogi of Bhuchri Mudra was Maharshi Byas Ji. The eldest yogi of the Unmanuni mudra was the king Janak.

These great men who received these five mudras were versatile, but the scriptures tell that all these great men had to go to Satguru after receiving it. It means that something was left to know and this is a serious matter.

It is clear from the fact that through both the present system we can not achieve the Supreme God. Even after receiving four types of salvation and heaven, we will not be able to get rid of the bonds of birth death. We have to come back to this world again.

भक्ति के प्रकार-

कबीर साहिब ने बताया कि इस दुनिया में दो तरह की भक्तियाँ प्रचलित हैं जिनके नाम हैं सगुण और निर्गुण भक्ति।

सगुण भक्ति –

इस उपासना पद्धती में मूर्ति पूजा, तीर्थ यात्रा, दान पुण्य के कार्य किये जाते हैं। इस भक्ति के माध्यम से मनुष्य स्वर्ग आदि लोकों को प्राप्त कर सकता है। क्योंकि सभी धर्मों के लोग स्वर्ग प्राप्ति के लिये चेष्टा रत हैं।

निर्गुण भक्ति-

यह भक्ति हमको पाँच मुद्राओं की ओर ले जाती है। खेचरी, भूचरी, चाचरी, उन्मुनी और अगोचरी। खेचरी मुद्रा के सबसे बड़े योगी ब्रह्मा, विष्णु व शंकर जी थे। चाचरी मुद्रा के सबसे बड़े योगी गोरखनाथ जी थे। अगोचरी मुद्रा के सबसे बड़े योगी शुकदेव जी थे। भूचरी मुद्रा के सबसे बड़े योगी ब्यास जी थे। उन्मुनी मुद्रा के सबसे बड़े योगी राजा जनक थे।

इन पञ्च मुद्राओं को पाने वाले ये महापुरुष इसके पारंगत थे परन्तु शास्त्र बताते हैं कि इन सभी महापुरुषों को इसे प्राप्त करने के बाद सतगुरु के पास जाना पड़ा। इसका मतलब ये है कि कुछ जानना शेष रह गया था और यह बड़ा गम्भीर विषय है।

इससे स्पष्ट हो रहा है कि वर्तमान की दोनों पद्धतियों के माध्यम से हम परमतत्व को प्राप्त नहीं कर सकते। चार प्रकार के मोक्ष तथा स्वर्ग को प्राप्त करने के बाद भी हम जन्म मृत्यु के बंधनों से मुक्त नहीं हो पायेंगे। हमको दुबारा इस संसार में आना पड़ेगा।

……………………..ओम सत्य साहिब…………………………….


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