The Unknown Secret of Mahabharata Part- 4

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Story ahead from Part-3

Preparation of the Mahabharata war-

Prior to the Mahabharata war, Pandavas laid their army on the banks of the river Hiranyvati river near the equator Panchak shrine settled on the southern bank of the Saraswati river in the western part of Kurukshetra. The Kauravas laid their army in a flat area at few distances in the eastern part of Kurukshetra.

In both camps, the best arrangements were made to cure the soldiers’ food and the injured. There was a separate system for keeping elephants, horses, and chariots. In each of the thousands of camps, many Vaidyas (Doctor) and Shilpa (Cook) were kept for the abundance of food items, weapons, instruments, as well as medical treatment. For the war between the two armies, a circle of approximately 40 km was left at the center.

Among the warriors who fought on behalf of the Kauravas, were primarily Bhishma, Dronacharya, Kripacharya, Karna, Ashwaththama, Madrnesa Saraya, Bhurishiva, Alambusa, Kalingaaraj, Shrutayudh, Shakuni, Khedadatta, Jaydarath, Vind-Unwind, Kambojraj, Sudarshana, Thirteen other warriors including Duryodhana and his 99 brothers were involved.

Among the warriors who fought on behalf of the Pandavas, Bhim, Nakul, Sahadev, Arjun, Yudhshaythir, five sons of Draupadi, Satyaki, Uttamauja, Virat, Drupada, Dhrishtadyumna, Abhimanyu, Pandyaaraj, Ghatotkach, Shikhandi, Yuyutsu, Kuntibhoja, Uttamauja, Shaibya, and Anupaj were involved.

On behalf of the Kauravas, warrior of the districts were supported were Gandhara, Madrid, Sindh, Kamboj, Kalinga, Sinhala, Dard, Abhishek, Magadha, Vampire, Kosala, Pratyahara, Bahlik, Boreal, Degree, Pallava, Saurashtra, Avanti, Nishad, Shursen, Shibi They were warriors of Vasati, Paurav, Tushar, Chuchkad, Ashok, Pandya, Poland, Parad, Azhudra, Pragjyotishpur, Mekal, Kuruvind, Tripura, Shal, Umth, Kaitav, Yawan, Thirgart, and Savior.

On behalf of the Pandava, warrior of the districts were supported were mainly Panchal, Chedi, Kashi, Karush, Fishery, Kakaya, Shrinjay, Dakshar, Somaak, Kunti, Anaptak, Dasherak, Champradar, Anupak, Kirat, Patcher, Chola, Pandya, Agnivytshya, Hund, Darbari, Shabar, Udhas, Vatsa, Pundra, Vampish, Pundra, Marut, Dhenuk, Takhan.

Some areas in which Vidarbha, Shalev, China, Lohitya, Sholay, Neptune, Konkan, Karnataka, Kerala, Andhra, Dravid, etc. did not participate in this war.

Rules of war-

On the advice of grandfather Bhishma, both the parties agreed to make some rules for the war. The rules they have made are:

• The time of war will remain from sunrise to sunset every day. After sunset, the war will not be there.

• After the end of the war, everyone will behave lovingly except for deceit.

• The battle of chariot driver will be fought with the same driver, Driver of an elephant with same and the soldier with soldier only.

• Only a hero will fight with a hero.

• No party will attack the weapon or the people who are fleeing from fear or coming to the shelter.

• There will be no weapon on unarmed warrior.

• There will be no weapon on the workers who support the war.

The beginning of the Mahabharata war –

On the first day, while Krishna and Arjun stood in the middle of the war field along with their chariots and were teaching Gita to Arjuna, Bhishma’s told all the warriors that the war will now start. The warrior who wants to change his clique this time is free.

After this announcement, the son of Dhritarashtra Yuyutsu went into the camp of Pandavas, leaving Kurwa camp. This was possible due to Yudhisthira’s activities. After Sri Krishna’s preaching, Arjuna announced the war by playing a conch named Devadatta. This war lasted for eighteen days.

On the eighteenth day, only three warriors of the Kauravas remained. Those names were Ashwaththama, Kripacharya, and Kritverma. On this day Ashwaththama took the pledge of the execution of Pandavas. Pandava camp was attacked in the night by the commander Ashwaththama, Krupacharya and Kritverma. Ashwaththama slaughtered all the Panchalas, the five sons of Draupadi, Dhrishtadyumna and Shikhandi, etc. Seeing this, Krishna cursed them to live like a leper until the end of Kali Yuga.

On this day, Bhima killed the remaining brothers of Duryodhana. Sahadev killed Shakuni. Duryodhana fled from there and hid in the column of the lake after seeing his defeat. During this time Balram (Krishna’s elder brother) was coming back from a pilgrimage. Seeing Duryodhana’s intimidation, he blessed the fearlessness. When the hidden Duryodhana was challenged by the Pandavas, then there was a war between them and he died after being hit on his stupor. This way Pandav will be victorious.

Yudhishthira become King-

Krishna declared Yudhisthira the king of Hastinapur. Under his leadership, Pandavas ruled the whole of 36 years there. During the reign of Yudhisthira, Gandhari blamed Krishna for the destruction of Kauravas and cursed that the same way that the descendants of Kurus were destroyed, so the Yaduvansh would also be destroyed. Lord Krishna was itself from Yaduvansh dynasty.

According to Gandhari, Lord Krishna had the option to stop the war and the power to go in favor of any one site. But they let the war happen. Krishna himself was the incarnation of Vishnu and knew that Brahmakpal has asked for the blood of eighteen Akshohini (40 lacs) soldiers instead of leaving Shankar. Therefore, war is necessary for Lord Shankar to get rid of the curse and after winning the war, Lord Shankar will be able to get rid of Brahmakpal only after the success of a Razsi yagya.

Remaining part of the story in – part 5…..

 

महाभारत के अनजान रहस्य भाग- 4

महाभारत युद्ध की तैयारी-

महाभारत युद्ध से पूर्व पांडवों ने अपनी सेना का पड़ाव कुरुक्षेत्र के पश्चिमी में सरस्वती नदी के दक्षिणी तट पर बसे समंत्र पंचक तीर्थ के पास सरस्वती नदी की सहायक नदी हिरण्यवती के तट पर डाला। कौरवों ने कुरुक्षेत्र के पूर्वी भाग में वहां से कुछ योजन की दूरी पर एक समतल मैदान में अपना पड़ाव डाला।

दोनों ओर के शिविरों में सैनिकों के भोजन और घायलों के इलाज की उत्तम व्यवस्था की गई थी। हाथी, घोड़े और रथों को रखने की अलग व्यवस्था थी। हजारों शिविरों में से प्रत्येक शिविर में प्रचुर मात्रा में खाद्य सामग्री, अस्त्र-शस्त्र, यंत्र के साथ-साथ चिकित्सा हेतु कई वैद्य और शिल्पी रखे गए थे। दोनों सेनाओं के युद्ध के लिए बीच स्थान पर 5 योजन यानी 40 किमी का घेरा छोड़ दिया गया था।

कौरवों की ओर से लड़ने वाले योद्धाओं में प्रमुख रूप से भीष्म, द्रोणाचार्य, कृपाचार्य, कर्ण, अश्वत्थामा, मद्रनरेश शल्य, भूरिश्र्वा, अलम्बुष, कृतवर्मा, कलिंगराज, श्रुतायुध, शकुनि, भगदत्त, जयद्रथ, विन्द-अनुविन्द, काम्बोजराज, सुदक्षिण, बृहद्वल, दुर्योधन व उसके 99 भाई सहित अन्य हजारों यौद्धा शामिल हुए।

पांडवों की ओर से लड़े रहे योद्धाओं में प्रमुख रूप से भीम, नकुल, सहदेव, अर्जुन,युधिस्ठिर, द्रौपदी के पांचों पुत्र, सात्यकि, उत्तमौजा, विराट, द्रुपद, धृष्टद्युम्न, अभिमन्यु, पाण्ड्यराज, घटोत्कच, शिखण्डी, युयुत्सु, कुन्तिभोज, उत्तमौजा, शैब्य और अनूपराज नील थे।

कौरवों की ओर थे साथ देने वाले जनपदों में गांधार, मद्र, सिन्ध, काम्बोज, कलिंग, सिंहल, दरद, अभीषह, मागध, पिशाच, कोसल, प्रतीच्य, बाह्लिक, उदीच्य, अंश, पल्लव, सौराष्ट्र, अवन्ति, निषाद, शूरसेन, शिबि, वसति, पौरव, तुषार, चूचुपदेश, अशवक, पाण्डय, पुलिन्द, पारद, क्षुद्रक, प्राग्ज्योतिषपुर, मेकल, कुरुविन्द, त्रिपुरा, शल, अम्बष्ठ, कैतव, यवन, त्रिगर्त, सौविर और प्राच्य के योद्धा थे।

पांडवों की ओर से साथ देने वाले जनपदों में प्रमुख रूप से पांचाल, चेदि, काशी, करुष, मत्स्य, केकय, सृंजय, दक्षार्ण, सोमक, कुन्ति, आनप्त, दाशेरक, प्रभद्रक, अनूपक, किरात, पटच्चर, तित्तिर, चोल, पाण्ड्य, अग्निवेश्य, हुण्ड, दानभारि, शबर, उद्भस, वत्स, पौण्ड्र, पिशाच, पुण्ड्र, कुण्डीविष, मारुत, धेनुक, तगंण और परतगंण के योद्धा थे।

कुछ क्षेत्र जिनमें विदर्भ, शाल्व, चीन, लौहित्य, शोणित, नेपा, कोंकण, कर्नाटक, केरल, आन्ध्र, द्रविड़ आदि ने इस युद्ध में भाग नहीं लिया।

युद्ध के नियम-

पितामह भीष्म की सलाह पर युद्ध के लिये दोनों दलों ने सहमत होकर कुछ नियम बनाए। उनके बनाए हुए नियम निम्नलिखित हैं-

  • युध्द का समय प्रतिदिन सूर्योदय से लेकर सूर्यास्त तक ही रहेगा। सूर्यास्त के बाद युद्ध नहीं होगा।
  • युद्ध समाप्ति के पश्‍चात छल-कपट छोड़कर सभी लोग प्रेम पूर्वक व्यवहार करेंगे।
  • रथी का युद्ध रथी से, हाथी वाले का हाथी वाले से और पैदल का पैदल के साथ युद्ध होगा।
  • एक वीर के साथ एक ही वीर युद्ध करेगा।
  • भय से भागते हुए या शरण में आए हुए लोगों पर कोई भी पक्ष अस्त्र-शस्त्र का प्रहार नहीं करेगा।
  • निहत्थे योद्धा पर कोई अस्त्र नहीं उठायेगा।
  • युद्ध में सहयोग करने वाले सेवकों पर कोई अस्त्र नहीं उठाएगा।

महाभारत युद्ध का आरंभ –

प्रथम दिन एक ओर जहां कृष्ण-अर्जुन अपने रथ के साथ दोनों ओर की सेनाओं के मध्य खड़े थे और अर्जुन को गीता का उपदेश दे रहे थे इसी दौरान भीष्म पितामह ने सभी योद्धाओं को कहा कि अब युद्ध शुरू होने वाला है। इस समय जो भी योद्धा अपना खेमा बदलना चाहे वह स्वतंत्र है।

इस घोषणा के बाद धृतराष्ट्र का पुत्र युयुत्सु डंका बजाते हुए कौरव दल को छोड़ पांडवों के खेमे में चले गया। ऐसा युधिष्ठिर के क्रियाकलापों के कारण संभव हुआ था। श्रीकृष्ण के उपदेश के बाद अर्जुन ने देवदत्त नामक शंख बजाकर युद्ध की घोषणा की।यह युद्ध कुल अठ्ठारह दिनों तक चला।

अठारहवें दिन कौरवों के केवलतीन योद्धा शेष बचे। जिनके नाम अश्वत्थामा, कृपाचार्य और कृतवर्मा थे। इसी दिन अश्वथामा द्वारा पांडवों के वध की प्रतिज्ञा ली। सेनापति अश्वत्थामा, कृपाचार्य व कृतवर्मा द्वारा रात्रि में पांडव शिविर पर हमला किया गया। अश्वत्थामा ने सभी पांचालों, द्रौपदी के पांचों पुत्रों, धृष्टद्युम्न तथा शिखंडी आदि का वध कर दिया।यह देख कृष्ण ने उन्हें कलियुग के अंत तक कोढ़ी के रूप में जीवित रहने का शाप दे डाला।

इस दिन भीम ने दुर्योधन के बचे हुए भाइयों को मार दिया। सहदेव ने शकुनि को मार दिया और अपनी दुर्योधन अपनी पराजय देखकर वहाँ से भाग गया और सरोवर के स्तंभ में जा छुपा। इसी दौरान बलराम तीर्थयात्रा से वापस आ रहे थे। उन्होंने दुर्योधन को डरा हुआ देखकर निर्भय रहने का आशीर्वाद दे दिया। 

छिपे हुए दुर्योधन को पांडवों द्वारा ललकारे जाने पर उनके बीच फिर युद्ध हुआ औ रउसकी जंघा पर प्रहार किए जाने से उसकी मृत्यु हो जाती है। इस तरह पांडव विजयी होगए।

युधिस्ठिर को राज़-

कृष्ण ने युधिष्ठिर को हस्तिनापुर का राजा घोषित किया। उनके नेतृत्व में पांडवों ने वहाँ पूरे 36 साल राज़ किया। युधिष्ठिर के राजतिलक के समय गांधारी ने कृष्ण को कौरवों के नाश होने को दोषी ठहराते हुए शाप दिया कि जिस प्रकार कौरवों के वंश का नाश हुआ है, वैसे ही यदुवंश का भी नाश होगा।

गांधारी के अनुसार, भगवान कृष्ण के पास युद्ध को रोकने की दिव्य शक्ति तथा किसी एक के पक्ष में जाने का विकल्प था। मगर उन्होंने युद्ध को होने दिया। कृष्ण खुद विष्णु के अवतार थे और जानते थे कि उनके कहने पर ब्रह्मकपाल ने शंकर को छोड़ने के बदले अठ्ठारह अक्षोहिणी सेना का रक्त मांगा है। इसलिए शंकर को ब्रह्मकपाल से छुटकारा दिलाने को युध्द आवश्यक है साथ ही युद्ध जीतने के पश्चात राजसी यज्ञ के सफल होने पर ही शंकर ब्रह्मकपाल से छुटकारा पा सकेंगे।

शेष- महाभारत के अनजान रहस्य- भाग 5 मैं

 

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