The Unknown Secret of Mahabharata Part- 5

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The destruction of Yadava dynasty-

The effect of Gandhari’s curse started on Yaduvans. Due to the curse, the condition of Shri Krishna’s city Dwarka started deteriorating. Krishna took all Yadav to Prabhas, but there was no escape from the violence. The entire Yadava was thirsty for each other’s blood and the entire dynasty ended with fighting each other. In this massacre, only Lord Krishna, Balram, Daruka, and Vavra survived.

Krishna’s city of Dwarka-

Dwarka was named after it is the city of many doors. There was a very long wall around this city with many doors. That wall is still located at the bottom of the sea. One of the oldest cities in India is Dwarka, also called the Dwarawati, Kush place, Aanartak, Okha-Mandal, Gomti Dwarka, Chakrityaarth, the inter-island, Waridurga, Udhidhimadhyasthana.

Dwarka is one of the four pilgrim places at the western end of the state of Gujarat and one of the best holy place. It is divided into two parts Gomti Dwarika and Bate Dwarika. Gomti Dwarika is pilgrim place and Bate Dwarika is called Puri. Here can be reached through the seaway.

The oldest name of Dwarika is Kunsthalle. According to mythology, this city was named as Kushasthali because of the sacrifice of Kush (A type of herb) in the sea. There are many temples and beautiful, picturesque and delightful places, along with the famous temple of Dwarikadheesh. During the Mughal period, Muslim invaders tried to break away many ancient temples here but they failed to end Dwarika.

Why Krishna went Dwarika –

Krishna killed King Kansa, therefore, his parent in law, the King of Magadh named Jarasangh had determined to eradicate the name of Krishna and Yadu dynasty. He used to attack Mathura and Yadavas frequently. Many of his friends were devil Kings. Ultimately, keeping in mind the security of the Yadavs, Krishna decided to leave. Krishna came to Kushasthali, on the suggestion of Garuda (Eagle bird). The present Dwarka town was already in the form of Kushasthali, Krishna restored this desolated city.

Durvasha Sage visits Dwarika-

Once Durvasha Rishi (sage)  came to Dwarika People were scared for the reasons for being him angry. His body smelled very dirty. Upon reaching there, Krishna asked him that the sage! Want a service? He said that make Kheer (a type of confection made by cooking rice in milk). If he was given Kheer, then he told him that call Rukamani( Krishna’s wife) also, and both of you used to rub this kheer on your body.

After rubbing, he got himself up in the chariot and started saying that both of you should pull this chariot. Rukmani got very tired and fall in the ground. Dhubasha descended from the chariot and began to say to Krishna that wherever you have made this pudding, that part of your body has become now like iron steel. And where you did not apply, the weakness of this organ will cause you to die. Krishna did not put a kheer under his feet, so he always hid his legs very much. After working for 36 years, he became a destitute due to the arrows in his feet.

After being immersed in the sea of ​​Dwarka and after the destruction of Yadav dynasty, Vajra Nabh, the grandson of Krishna, remained the last ruler of Yaduvansh who had survived in the battle of the Yudunas. After sank in the sea of ​​Dwarka, Arjuna went there and took them all to Hastinapur. Vajra Nabha was declared King. The area of ​​Mathura is called Brij Mandal by the name of Vajra Nabh.

Why Krishna keeps Barbarik away from war-

After the victory of Pandavas, there was to be a royal yajna (The Yagna is done only for the purpose of devotion). And the discussion on the fight of Mahabharata was going on after sunset. Then Barbarik came there. Laughter was coming to him after the talks. Krishna asked him what your opinion is. He said that he could end this fight only in one day.

Krishna asked that you have only three arrows and you say that you will finish this fight in a single day. I did not understand how you can end 40 million people with only three arrows? Tell you the effect of your arrow?

He pointed to a huge tree and told Barbarik that can you pierce all the leaves of this tree with your arrows? Before saying, Krishna had hidden some leaves of the tree under his feet. Barbaric accepted and removed an arrow from his quiver and ran on the tree. The arrow hit the entire leaf of the tree and came back to its quiver. Seeing this, Krishna was astonished and he saw hidden leaves under his feet and he also had a hole in them.

Krishna thought that his arrows have the power to pierce the leaves hidden beneath my feet; maybe I too die in this war. He thought and told Barbaric that you will not favor anyone in this fight. You will be witness to this battle so that the selection of the best warrior can be possible.

The remaining – unknown secret of the Mahabharata, Part 6

महाभारत का अनजान रहस्य – भाग 5

 यादव कुल का नाश-

गांधारी के दिए श्राप का असर यदुवंश पर होने लगा। श्राप के चलते श्री कृष्ण की द्वारका की हालत बिगड़ने लगी। कृष्ण सारे यादव कुल को प्रभास ले गए, लेकिन वहां भी हिंसा से पीछा नहीं छूटा। पूरा यादव कुल एक-दूसरे के खून का प्यासा हो गया और पूरा वंश ही आपस में लड़कर खत्म हो गया। इस नरसंहार में सिर्फ भगवान कृष्ण, बलराम, दरुका और वभ्रू ही बचे।

कृष्ण की नगरी द्वारिका-

कई द्वारों का शहर होने के कारण इसका नाम द्वारका पड़ा था। इस शहर के चारों ओर बहुत ही लंबी दीवार थी जिसमें कई द्वार थे। वह दीवार आज भी समुद्र के तल में स्थित है। भारत के सबसे प्राचीन नगरों में से एक है द्वारिका। द्वारिका को द्वारावती, कुश स्थली, आनर्तक, ओखा- मंडल, गोमती द्वारिका, चक्रतीर्थ, अंतरद्वीप, वारिदुर्ग, उदधिमध्यस्थान भी कहा जाता है। 

द्वारका गुजरात राज्य के पश्चिमी सिरे पर समुद्र के किनारे स्थित चार धामों में से एक धाम और सात पवित्र पुरियों में से एक पुरी है। द्वारका दो हिस्सों में बंटी हुई है। गोमती द्वारिका और बेट द्वारिका। जिनमें गोमती द्वारिका को धाम कहते हैं और बेट द्वारिका को पुरी कहते है। बेट द्वारिका के लिए समुद्र मार्ग से जाना पड़ता है। 

द्वारिका का प्राचीन नाम कुशस्थली भी है। पौराणिक कथाओं के अनुसार महाराजा रैवतक के समुद्र में कुश बिछाकर यज्ञ किया था इस कारण इस नगरी का नाम कुशस्थली हुआ। यहां द्वारिकाधीश का प्रसिद्ध मंदिर होने के साथ ही अनेक मंदिर और सुंदर, मनोरम और रमणीय स्थान हैं। मुगल काल के समय मुस्लिम आक्रमणकारियों ने यहां के बहुत से प्राचीन मंदिरों को तोड़कर समाप्त करने का प्रयास किया परन्तु वे द्वारका को समाप्त करने में विफल रहे।

कृष्ण क्यों गए द्वारिका –

कृष्ण ने राजा कंस का वध कर दिया तो कंस के श्वसुर मगधपति जरासंध ने कृष्ण और यदुओं का नामोनिशान मिटा देने की ठान रखी थी। वह मथुरा और यादवों पर बारंबार आक्रमण करता था। उसके कई मलेच्छ और यवनी मित्र राजा थे। अंतत: यादवों की सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए कृष्ण ने मथुरा को छोड़ने का निर्णय लिया। विनता के पुत्र गरूड़ की सलाह एवं ककुद्मी के आमंत्रण पर कृष्ण कुशस्थली आ गए। वर्तमान द्वारिका नगर कुशस्थली के रूप में पहले से ही विद्यमान थी, कृष्ण ने इसी उजाड़ हो चुकी नगरी को पुनः बसाया। कृष्ण अपने कुल-बंधुओं के साथ द्वारिका आ गए।

दुर्वाषा ऋषि का द्वारिका आगमन-

एक बार दुर्वाषा ऋषि द्वारिका आये। गुस्सेल प्रवृत्ति का होने के कारण उनसे लोग डरते थे। उनके शरीर से बहुत गन्दी बदबू आती थी। द्वारिका पहुंचने पर कृष्ण ने उनसे पूछा कि ऋषि! क्या सेवा चाहते हैं? दुर्बाषा ने कहा कि खीर बनवाओ। खीर बनने के बाद उनको दी गई तो वह कृष्ण से बोले कि रुकमणी को भी बुलाओ और तुम दोनों लोग इस खीर को अपने शरीर पर मल लो। वह खीर को मलवाने के बाद खुद रथ पर चढ़ गये और कहने लगे कि अब तुम दोनों इस रथ को खींचो। रथ खींचते-खींचते रुक्मणि थक कर गिर गई।

दुर्बाषा रथ से उतरे और कृष्ण से कहने लगे कि जहाँ-जहाँ तुमने ये खीर लगाई है, तुम्हारे शरीर का वह अंग अब बज्र का हो गया है। और जहाँ तुमने नहीं लगाई, उसी अंग के कमजोर होने से तुम्हारी मृत्यु होगी। कृष्ण ने अपने पैरों के नीचे तले में खीर नहीं लगाई थी इसलिये कृष्ण हमेशा अपने पैर बहुत छुपा कर रखते थे और उनको छुपाये-छुपाये घूमते थे। 36 वर्ष राज्य करने के बाद पैर में तीर लगने के कारण उनका देहावसान हुआ।

द्वारिका के समुद्र में डूब जाने और यादव कुलों के नष्ट होने के बाद कृष्ण के प्रपौत्र वज्रनाभ द्वारिका में यदुवंश के अंतिम शासक रहे जो यदुओं की आपसी लड़ाई में जीवित बच गए थे। द्वारिका के समुद्र में डूबने पर अर्जुन द्वारिका गए और वज्रनाभ तथा शेष बची यादव महिलाओं को हस्तिनापुर ले गए। वज्रनाभ को हस्तिनापुर में मथुरा का राजा घोषित किया। वज्रनाभ के नाम से ही मथुरा क्षेत्र को ब्रजमंडल कहा जाता है। 

कृष्ण द्वारा बर्बरीक को युद्ध से दूर रखना-

पांडवों की जीत के बाद राजसी यज्ञ होना था। और महाभारत की लड़ाई की चर्चा चल रही थी। तब वहां बर्बरीक आया हुआ था। उसको वार्ता सुनकर हँसी आ रही थी। कृष्ण ने उससे पूछा कि तुम्हारा क्या मत है। बर्बरीक ने कहा कि वह इस लड़ाई को केवल एक ही दिन में समाप्त कर सकता है।

कृष्ण ने पूछा कि तुम्हारे पास केवल तीन ही बाण हैं और तुम कहते हो कि तुम इस लड़ाई को एक ही दिन में खत्म कर देते। तीन बाण से लगभग 40 लाख लोगों को समाप्त करने की बात समझ नहीं आयी। तुम अपने बाण का प्रभाव बताओ।

कृष्ण ने एक विशाल पेड़ की ओर इशारा करते हुए बर्बरीक से कहा कि क्या तुम अपने तीरों से इस पेड़ के सारे पत्तों में छेद कर सकते हो? कृष्ण ने कहने से पहले उस पेड़ के कुछ पत्ते अपने पैरों के तले में छुपा लिये थे। बर्बरीक ने कृष्ण की बात स्वीकार की और अपने तरकश से एक तीर निकालकर पेड़ पर चला दिया। वह तीर पेड़ के सारे पत्तों को छेद करता हुआ वापस उसके तरकश में आ गया। यह देखकर कृष्ण को बड़ा आश्चर्य हुआ और उन्होंने अपने पैर के नीचे छुपाये पत्ते देखे तो उनमें भी छेद हो गए थे।

 कृष्ण ने सोचा कि इसके तीरों में मेरे पैर के नीचे छुपाये पत्तों को भी छेदने की शक्ति है, हो सकता है कि इस युद्ध में मेरी भी मृत्यु हो जाये। उन्होंने विचार किया और बर्बरीक से कहा कि तुम इस लड़ाई में किसी का पक्ष नहीं लोगे। तुम इस लड़ाई के गवाह बनोगे ताकि श्रेष्ठ योद्धा का चयन सम्भव हो सके।

शेष- महाभारत का अनजान रहस्य भाग 6 मैं

 
 
 
 

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