What is Relegion, Anyway?

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Religion explains the method of life and the process of attaining God. The real religion is formed from the inclusion of these two. Conduct, thought and good conduct is the only religion. The person who is ethical, his conduct will be sacred. The person who discharges his duties with integrity and who is loyal to his actions, the same person is religious.

A person can become religious even after getting discontented with the rules of worshiping the person. Seeing and lifting the history, instead of worshiping the Sant Ravidas shrines in the temples, the shoe used to follow their religion. Such great men will find those who regard their deeds (karma) as religion only. Basically his religion is honorable, which is to be held which is worthy of the hold. The thoughts, the character and ethics that we hold in life, are the same lifestyles.

Religion means duty. Therefore, people are often said to have son’s religion, student religion, wife religion, social religion, nation religion etc. Religion is what the great men go on. Legends that later become the inspiration for the society. Society too accepts such great men as God. Many people have followed the paths described by them in order to follow their way of life and walk in the way. Due to following different routes, their names also got different, but they all remained the same.

It was said in the a holy Gita that if death also happens in the discharge of its duty, then it is not okay to obstruct the discharge of the duty of others. Adhering to religion is the discharge of its moral duties. Whether you walk in any path, if humanity is not hidden in the path of that duty then it can not be religion

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धर्म जीवन पद्धति और ईश्वर प्राप्ति के संसाधन बताता है। इन दोनों के समावेश से सच्चे धर्म का निर्माण होता है। आचरण, विचार और सद्चरित्र ही धर्म है। जो व्यक्ति नैतिक है, उसका आचरण पवित्र होगा। जो व्यक्ति अपने कर्तव्यों का ईमानदारी के साथ निर्वहन करता है तथा जो अपने कर्मों के प्रति निष्ठावान है, वही व्यक्ति धार्मिक है।

ईस्वर को पूजने के नियमों से विरत होकर भी व्यक्ति धार्मिक हो सकता है। इतिहास उठा कर भी देख लें तो संत रविदास मंदिरों में बैठकर पूजा करने के बजाय जूते सिलकर अपने धर्म का पालन करते थे। ऐसे  कितने ही महापुरुष मिल जाएंगे जिन्होंने अपने कर्म को ही धर्म माना। मूल रूप से धर्म का तातपर्य है जो धारण किया जाए, जो धारण करने योग्य हो। जो विचार, चरित्र और नैतिकता हम जीवन में धारण करते हैं, वही जीवन पद्धति है।

 धर्म का अर्थ है कर्तव्य।  इसलिए प्रायः लोग कहते भी हैं पुत्र धर्म, छात्र धर्म, पत्नी धर्म, सामाजिक धर्म, राष्ट्र धर्म इत्यादि। धर्म वही है जिस पर महापुरुष चलते हैं। जो महापुरूष आगे चलकर समाज के लिए प्रेरणास्रोत बन जाते हैं। समाज भी ऐसे महापुरुषों को ईश्वर के रूप में स्वीकार कर लेता है। अपनी जीवन पद्धति को ईस्वर मार्ग में चलाने के लिए अनेक लोगों ने उनके बताए मार्गों का अनुसरण किया है। अलग अलग मार्गों के अनुसरण करने के कारण उनके नाम भी अलग अलग पड़ गए, परंतु सबकी मंजिल एक ही रही।

गीता में कहा गया कि अपने कर्तव्य के मार्ग के निर्वहन में यदि मृत्यु भी हो जाये तो कोई बात नहीं, लेकिन दूसरों के कर्तव्य निर्वहन में बाधा डालना उचित नहीं। धर्म का पालन करना ही अपने नैतिक कर्तव्यों का निर्वहन है। चाहे आप किसी भी मार्ग में चलें, यदि उस कर्तव्य मार्ग में मानवता नहीं छुपी है तो वह धर्म नहीं हो सकता।

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