What is Soul, Anyway?

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What is the soul? The soul is a pure consciousness. The soul is auspicious. The soul is meditation. In the blog, we get its proof. King Janak said to the people that one moment can give self-knowledge. Ashtavakra said I will give enlightenment in one moment. The story is also mentioned as Bhagwat Gita too.

Ashtavakra said that “O” King Janak if you want to enlighten, then dedicating your mind and wealth to me. The king said that alright, I surrender you my  mind.  Ashtavakra said, ” your heart and mind. are mine now” The King said, “Yes.” Ashtavakra said,  your physical body is mine too. Do not think that your wife, a child, brother, a sister, and mother, father, house and have your relatives. You have given me the gift, you are completely mine. It is nothing for you; this body is mine. King Janak has said okay. your money is also mine, currency, diamond, gems, Army, castle etc. It is not yours now, father said okay I dedicate this to you all. Ashtavakra said, “You are not aware of this, because you have become mine.

I command you to not to take any decision and resolve any decision with this mind if you have it? The King Janak closed the eyes and said, today you have given me the knowledge of the soul. I have become aware of the soul.

Here the question arises that if Ashtavakra removed his soul from King Janak and showed that the father’s view is that your soul. If it is so there must be three people i.e King Janak, the second soul of KingJanakk and Ashtravakra too. Therefore, this soul has not any viewer. It cannot be seen. These senses cannot see this soul. Because the soul is beyond the limits of it. The mind which remains after the stopping of the intellect mind ego is the soul.

Therefore all the Theology are advising to practice meditating meditation and meditation. All are saying to meditate because when we are concentrated, this soul is the ability to see without the eyes, It has the ability to perform all works without the nose, ears, mouth, and body. If meditation gets concentrated then you will know yourself.  Therefore, if the mind does not concentrate, it becomes confused all the time.

In the Gita, Shri Krishna had told Arjuna that Arjuna is not the soul of this soul, yet it can see from all directions, Arjun is not the ears of this soul, yet he can hear from all directions. It can work again and again from all directions even if it does not have hands. The realization of spiritual wisdom was given by Shri Krishna to Arjuna in the Bhagwat Gita. Therefore, to attain enlightenment, O Arjun, you should preserve the mind.

This implies that whatever is being contemplated inside us, it is not the soul too, and the soul is beyond the resolution of choice. What we are reminding is that this work is to be done. It is not the soul to do that work. The physical activity that we perform every day is not a soul too. That is the mind. We, humans, are confused in this. There is a realization of mind. As there is an empty pitcher, there is a void inside it, when the blossom splits, then where did it go? It was because of the scattering of the scum, the zero remained the same. Similarly, the soul is present everywhere. The soul is stable whereas the mind is unstable. The spirit is experiencing the body due to its existence.

Therefore, the creature revolves around the twenty-four-hour resolution and alternates. It is a game of mind.The mind is not leaving the life free for a moment. Thus the mind keeps this soul confusing at all times. Body and wonderful things of the world do not allow the soul to move towards their original place of the ultimate man.

Now notice that when a child is crying, the mother spends her attention by giving toys in her hand and she stops crying. Mother gave her a toy and removed her attention from the original and said something like that. Examples are not known it is said that neither did we feel confused like this. Goswami said that in the light of the fact that you should not understand this story,

“SUNAHU TAAT YE AKATH KAHANI, SAMJHAT BIRHEY N JAAY BAKHANI, ISWAR ANSH JEEV AVINASHI, CHETAN AMAL SAHAJ SUKHRASI, SOO MAYA BS BHAYO GUSAAE, BANDHYO KEER KARKAT KE MAAHI”

This soul is bound. It is false, but it seems to be true even now. The spirit has assumed this body with ignorance, it has kept hold of it, and otherwise no one can hold the soul. Such the monkey cannot free his body without opening the clay in the pit, in the same way the organism cannot compete without understanding the mind.

Kabir’s Bhandara


आत्मा-

आत्मा एक शुद्ध चेतना है।आत्मा सुरुति है।आत्मा ध्यान है।शास्त्रों मै इसका प्रमाण भी मिलता है।

राजा जनक ने प्रजा से कहा कि कोई एक पल मै आत्मज्ञान दे सकता है।विद्वानों और महान ज्ञानियों ऋशियों महापुरुषों व् आचार्यों की सभा करायी गयी थी।अष्टावक्र उठे बोले मै एक पल मै आत्मज्ञान दूंगा।

अष्टावक्र का भगवतगीता मै भी उल्लेख है।अष्टावक्र ने कहा कि हे राजा जनक यदि आप मुझसे आत्मज्ञान चाहते हैं तो अपना तन मन और धन मुझे समर्पित करो।राजा जनक ने कहा कि तन मन धन मैंने आपको दिया।

अष्टावक्र बोले  हे जनक आज से तुम्हारा तन मन धन मेरा हुआ।राजा जनक ने कहा हाँ आपका हुआ।अष्टावक्र बोले आज से आपका तन मेरा है तुम मत सोचना कि आपके बीबी बच्चे है भाई है बन्धु है माता है पिता है घर है नातेदार है।तुमने तन मुझे दे दिया तुम मेरे हो।इसमे से कुछ भी तुम्हारा नही है यह तन मेरा है।राजा जनक बोले ठीक है।

हे जनक तुम्हारा धन भी मेरा है रुपया पैसा हीरे जवाहरात सेना फोज़ किले इत्यादि यह सब अब् तुम्हारा नहीँ है। जनक बोले ठीक है ये सब मैं आपको समर्पित करता हूँ।

अष्टावक्र बोले हे जनक खबरदार अब तुम इस मन से भी कुछ नहीँ सोचोगे क्योंकि तुम्हारा मन भी मेरा हो चुका है।मेँ तुमको आज्ञा देता हूँ कि इस मन से कोई भी संकल्प, विचार, निर्णय, याद और कोई क्रिया भी नहीं करना।खामोश होकर देखो क्या बचा है अब तुम्हारे पास।

राजा जनक ने ऑंखें बंद की और बोले हे गुरुवर आज आपने मुझे आत्मा का ज्ञान करा दिया।मुझे आत्मा का ज्ञान हो गया।

यहाँ पर यह सवाल उठता है कि क्या अष्टावक्र ने राजा जनक को उनकी आत्मा क्या निकालकर दिखायी कि हे जनक देखो ये है तुम्हारी आत्मा ? अगर ऐसा होता तो तीन लोग होते।एक अष्टावक्र एक जनक और एक जनक की आत्मा।इसलिये इस आत्मा का कोई द्रष्टा नहीं है।ये इन्द्रियाँ इस आत्मा को नही देख सकतीं।क्योंकि आत्मा इनसे सर्वथा परे है।मन बुद्धि चित्त अहंकार के रुकने के बाद जो शेष बचता है वह आत्मा है।

इसलिये सभी धर्मशास्त्र ध्यान ध्यान ध्यान कह रहे है।ध्यान लगाने को बोल रहे है।सभी ध्यान लगाने को इसलिये बोल रहे है क्योंकि जब हम एकाग्र होते है तो इस आत्मा मै बगैर ऑंखों के ही देखने की क्षमता है बगैर नाक, कान, मुंह, शरीर यह सारे काम कर सकती है।यदि ध्यान एकाग्र हो गया तो आप अपने को जान जाएंगे।इसलिये मन एकाग्र नहीँ होने देता।  वह ध्यान को हर समय भ्रमित करके रखना चाहता है।

गीता मै श्री कृष्ण ने अर्जुन से कहा था कि हे अर्जुन इस आत्मा कि आँखे नहीँ हैं फिर भी ये सभी दिशाओं से देख सकती है,हे अर्जुन इस आत्मा के कान नहीँ हैं फिर भी सभी दिशाओं से सुन सकती है।हे अर्जुन इस आत्मा के हाथ पैर नहीं फिर भी सभी दिशाओं से चल फिर और काम कर सकती है।आत्म ज्ञान का बोध श्री कृष्ण ने गीता मै अर्जुन को दिया था। इसलिये आत्मज्ञान को पाने के लिए हे अर्जुन तुम मन का निग्रह करो।

इसका तात्पर्य यह है कि जो हमारे अंदर चिंतन हो रहा है यह भी आत्मा नहीँ है,आत्मा संकल्प विकल्प से परे है।जो हमें याद आ रहा है  कि यह काम करना है वह काम करना है यह भी आत्मा नहीँ है।जो शारीरिक क्रियाएँ हम रोज करते हैं यह भी आत्मा नही है।यानि यह मन है।आम आदमी इसी मै उलझा हुआ है।कभी कुछ याद आ रहा है कभी कुछ करना है इसलिये आत्मा व्यस्त हो गयी।आत्मा के शरीर मै होने कि यह मन की एक अनुभूती है।

जैसे एक खाली घड़ा है उसके अंदर एक शून्य है जब घड़ा फूट गया तो शून्य कहाँ गया।शून्य तो वहीँ रहा क्योंकि शून्य घड़ा फूटने के बाद फैला थोड़ी वह शून्य वही रहा।

इसी तरह आत्मा सब जगह विद्यमान है,आत्मा स्थिर है जबकि मन अस्थिर है।आत्मा का अनुभव शरीर होने के कारण हो रहा है।इसलिये जीव चोबीशों घंटे संकल्प ओर विकल्प मै घूमता रहता है।यह मन का खेल है।मन एक पल के लिये भी जीव को फ्री नहीं छोड़ रहा है।इस प्रकार यह मन इस आत्मा को हर समय भ्रमित करके रखता है।मन और माया आत्मा को अपने मूल स्थान परम पुरुष की तरफ नहीं जाने देतीं।

अब आप गौर करें कि जब छोटा बच्चा रोता है तो माँ उसके हाथ मै खिलौना देकर उसका ध्यान बंटा देती है और वो रोना बंद कर देता है।माँ ने खिलौना देकर उसका ध्यान मूल से हटा कर कहीँ और कर दिया।उदाहरण से  पता नहीं चलता कि कही न कहीँ हमको भी मन ने ऐसे ही उलझा रखा है।

गोस्वामी जी ने कहा कि

सुनहु तात ये अकथ कहानी,समझत बिरहे न जाय बखानी,

ईश्वर अंश जीव अविनाशी, चेतन अमल सहज सुखराशी,

सो माया बस भयो गुशाइ बन्धयो कीर मर्कट के माही।

यह आत्मा बंध गयी है।यह गठान झूठी है परंतु फिर भी सच लग रही है।आत्मा ने अज्ञान वस इस शरीर को धारण किया हैं इसको पकड़कर रखा है वरना आत्मा को कोई पकड़ नहीं सकता।जैसी बन्दर चनों को घड़े के अंदर मुठी खोले बिना अपने को मुक्त नहीं कर सकता उसी प्रकार जीव भी मन को समझे बिना उससे टक्कर नहीं ले सकता।

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