Where is Supreme God

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God is supreme power, it is not a person. So you will not find him out somewhere. Whenever you try, you will not get such a moment when you will be able to see God standing in front of you. There is no way to see the soul directly, because God is self-contained in itself. Direct interview can be of individuals, objects can be. It is also important to understand that God is an immense power, very unique in nature. Powers are also of two types, and it is pervading all directions in all directions. A subjective and other is objective power.

Power of God is subjective whereas power of the object is objective.Objective power is a power that can be seen, but the subjective power is such a power that is always seen in the viewer, cannot be seen as a visual because it is not in the scene but rather in the seer.Being conscience of conscience, we can never see him. Because we are only seeing through him. That energy is also present in us too. It is not that the energy is not out. She is outside too. But to see it first, we have to experience within ourselves.And the person who experiences that energy within himself, it becomes visible everywhere. For those who see that light within, there remains no other than that light in the whole world. But his first experience, first initiation, his first intercourse must be from within. That is the inner power.

Finding God out is useless It is necessary not to go to Himalaya to find it, nor to wander in Tibet’s mountains. No Mecca Medina, neither Kashi nor Prayag, nor Girnar, nor Jerusalem. The outer search is a directionless effort towards finding God. This effort will be considered as an early attempt to easily and ignorant. It would be appropriate to regard this as an early education of divine discovery. If a long period of life is going on this path, then a big part of the life span is decided to be wasted. This will increase the difficulty of real search.

If God was in any fixed place, there was no obstruction even if we had reached a certain place, we would have reached it there. It could have been an easy way. The outside journey is not too difficult. Any hurdle, outside travel can be done to complete some of the resources. We get the floor. But the difficulty of reaching towards God is that he is not at the end of outer search, he is present within the seeker from the beginning. He is not present in the outer floor and is present within the seeker.

Reverence Dedication


परमात्मा-

एक सर्वोच्च शक्ति है, यह कोई व्यक्ति नहीं है। इसलिए आप उसे बाहर कहीं खोज नहीं पाएंगे। आप कितना भी प्रयत्न कर लें, आपको ऐसा कोई ऐसा क्षण प्राप्त नहीं होगा, जब आप परमात्मा को अपने सामने खड़ा देख पाएंगे।परमात्मा को प्रत्यक्ष देखने का कोई उपाय नहीं है,क्योंकि परमात्मा तो स्वयम् आपमें ही समाहित अनुभूति है। प्रत्यक्ष साक्षात्कार तो व्यक्तियों का हो सकता है, वस्तुओं का हो सकता है। यह भी समझ लेना जरूरी है कि परमात्मा एक असीम शक्ति है, बहुत विशिष्ट ढंग की है। शक्तियाँ भी दो प्रकार की हैं, और यह सभी दिशाओं में चारों तरफ व्याप्त है। एक सब्जेक्टिव ओर दूसरी ऑब्जेक्टिव शक्ति।  परमात्मा की शक्ति सब्जेक्टिव है जबकि बिजली की शक्ति ऑब्जेक्टिव। 

 

ऑब्जेक्टिव शक्ति एक ऐसी शक्ति है जो देखी जा सकती है, परंतु सब्जेक्टिव शक्ति एक ऐसी शक्ति है, जो सदा देखने वाले में होती है उसे दृश्य की तरह नहीं देखा जा सकता क्योंकि ये दृश्य में नहीं होती, बल्कि द्रष्टा में होती है। अंतरात्मा की ऊर्जा  सब्जेक्टिव होने के कारण हम  उसे कभी भी देख नहीं सकते। क्योंकि हम उसी के द्वारा ही तो देख रहे होते हैं।  हमारे में भी वह ऊर्जा  मौजूद हैं।  ऐसा नहीं है कि वह ऊर्जा बाहर नहीं है। वह बाहर भी है। लेकिन उसे देखने के लिए पहले अपने भीतर अनुभव करना होता है। और जो व्यक्ति उस ऊर्जा को अपने भीतर अनुभव कर लेता है, उसे वह सब जगह दिखने लग जाती है। जो उस ज्योति को भीतर देख लेता है, उसके लिए सारे संसार में उस ज्योति के अतिरिक्त कुछ भी नहीं रह जाता। लेकिन उसका पहला अनुभव, पहली दीक्षा, उसका पहला संस्पर्श भीतर से ही होना जरूरी है। वह अंतर्तम ऊर्जा है।

 

परमात्मा को बाहर खोजना व्यर्थ है। उसे खोजने के लिए हिमालय जाना जरूरी है, तिब्बत के पर्वतो में भटकना। मक्का मदीना , काशी और प्रयाग, गिरनार, जेरूसलम। बाहर की खोज तो परमात्मा को खोजने की दिशा में एक किया गया एक दिशाहीन प्रयास है। यह प्रयास आसानी से और अज्ञान वश किया गया एक प्रारंभिक प्रयास ही माना जायेगा। इसको परमात्मा की खोज की प्रारंभिक शिक्षा माना जाना उचित होगा यदि जीवन में लंबे अंतराल तक इसी राह पर चलना रहा तो जीवन अवधि का एक बड़ा हिस्सा व्यर्थ होना तय है। इससे वास्तविक खोज की राह में बहुत कठिनाई बढ़ जाएगी।

 

अगर परमात्मा किसी तय स्थान पर होता तो भी कोई अड़चन थी, हम वहा पहुंच ही जाते। यह एक सरल रास्ता हो सकता था।  बाहर की यात्रा जरा भी कठिन नहीं है। कितनी भी अड़चन हो, बाहर की यात्रा किसी किसी संसाधन के पूर्ण की जा सकती है। हमको मंजिल मिल ही जाती है। लेकिन परमात्मा की तरफ पहुंचने की कठिनाई यही है कि वह बाहरी खोज के अंत में नहीं है, वह खोजने वाले के भीतर प्रारंभ से ही मौजूद है। वह बाहरी मंजिल में होकर खोजने वाले के भीतर ही मौजूद है।

 

 

 

 

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