World is a fantasy

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In Yoga Vashishta Ramayana, there was the talk of enlightenment between Shri Ram and Guru Vasishta. Vashistha proved Rama’s curiosity by proving this world a fantasy.

Shri Ram asked his master Vasishtha, “O Gurudev”, what is the knowledge and mystery of the soul that only human beings across the world through the senses?” He replied let I explain to you why this world is fantasy?

Vasishtha ji replied that “O Ram” Just as we are frightened by imagining a snake in a rope, but the next moment when we have the knowledge that this snake is not a rope then all our fears disappear. At that time if we too wish that as if the fear of rope came as a snake, then now that fear can not happen again, because now we have become aware that the rope is not a snake.

Likewise, after having knowledge of enlightment “O Ram”, we can see the existence of the world made of five material elements and come to know that I am not the body, I am a soul. I do not have any senses, nor have I been made of five material elements. As the knowledge of the rope disappears the existence of the snake, in the same way, the existence of this world itself also ends when there is enlightenment.

After being enlightened, if any enlightenment believes this world as true, then it will not be able to accept it. He will continue to see this knowledge repeatedly because the truth is this. Thus, after receiving element of knowledge, hey Ram, The existence of this world does not exist.

In the pre-human life, there is a state of doubt with enlightenment, which is why the world seems true. Otherwise, this world is not there. This world is seen in one of the four states of mind in a waking state. This is what we also dream about. Dreams also seem true to us. Waking up from sleep, her truth is revealed. All this is mere imagination of our mind, nothing more than that.

संसार एक कल्पना

योगा वशिष्ठ रामायण में श्री राम तथा गुरु वशिष्ठ के बीच आत्मज्ञान को लेकर संवाद हुआ था। वशिष्ठ ने इस संसार को एक कल्पना सिद्ध कर राम की जिज्ञासा पूर्ण की।

श्री राम ने अपने गुरु वशिष्ठ से पूछा कि “हे गुरुदेव” आत्मा का ऐसा क्या ज्ञान व रहस्य है कि जिसे महसूस करने मात्र से मनुष्य संसार सागर से पार हो जाता है?

वशिष्ठ जी ने उत्तर दिया कि “हे राम” जिस तरह भृमवश हम एक रस्सी में साँप की कल्पना करके भयभीत हो जाते हैं और हमको भय आ जाता है लेकिन अगले ही पल जब हमको यह ज्ञान हो जाता है कि यह साँप नहीं एक रस्सी है तो हमारा सारा भय दूर हो जाता है। उस समय यदि हम खुद भी चाहें कि जैसा भय रस्सी को साँप मानकर आया था, फिर से अब वैसा भय नहीं आ सकता है क्योंकि अब हमको ज्ञान हो गया कि वह साँप नहीं रस्सी है।

इसी तरह “हे राम” आत्मा का ज्ञान होने के बाद हमको इस पंच भौतिक तत्वों से बने संसार का अस्तित्व ही समाप्त नजर आता है। आत्मज्ञान हो जाने पर हमको पता चल जाता है कि मैं शरीर नहीं हूँ। मेरी कोई इन्द्रियाँ भी नहीं हैं और ना ही मैं पंच भौतिक तत्वों का बना हुआ हूँ। जिस प्रकार रस्सी का ज्ञान होने पर साँप का अस्तित्व खत्म हो जाता है ठीक उसी प्रकार आत्मज्ञान होने पर इस संसार का अस्तित्व भी स्वयं समाप्त हो जाता है।

आत्मज्ञान होने के बाद यदि कोई आत्मज्ञानी इस संसार को सच माने तो वह मान ही नहीं पायेगा। उसको इस ज्ञान का बार-बार आभास होता रहेगा क्योंकि सत्य यही है। इस प्रकार तत्व ज्ञान के प्राप्त होने के बाद हे राम इस संसार का आस्तित्व रहता ही नहीँ है।

आत्मज्ञान से पूर्व मनुष्य में भृम की अवस्था रहती है जिस कारण यह संसार सच लगता है। वरना ये संसार तो है ही नहीं। यह संसार तो मन की चार अवस्थाओं में से एक जाग्रत अवस्था में देखा गया आभास है। यही बात हम स्वप्न की अवस्था में भी करते है। स्वप्न भी हमको सच्चा ही लगता है। नींद से जागने पर उसकी सच्चाई पता चल पाती है। यह सब हमारे मन की कल्पना मात्र है, इससे ज्यादा कुछ नहीं।

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